महामृत्युञ्जय मन्त्र

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पञ्चमः पाठः - सुभाषितानि

शेमुषी

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आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान्‌ रिपु: । नास्त्युद्यमसमो बन्धु: कृत्वा यं नावसीदति ॥1॥ निश्चय से आलस्य मनुष्यों के शरीर में रहने वाला सबसे बड़ा दुश्मन है। परिश्रम के समान उसका कोई मित्र नहीं है जिसको करके वह दुखी नहीं होता है। गुणी गुणं वेत्ति न वेत्ति निर्गुणो, बली बलं वेत्ति न वेत्ति निर्बल: । पिको वसन्तस्य गुणं न वायस:, करी च सिंहस्य बलं न मूषक: ॥2॥ गुणवान् व्यक्ति गुण (के महत्व) को जानता है गुणहीन नहीं जानता। बलवान् व्यक्ति बल (के महत्व) को जानता है जबकि बलहीन (निर्बल) नहीं जानता है। कोयल वसन्त ऋतु के (महत्व) गुण को जानती है, कौआ नहीं जानता है, और शेर के बल को हाथी जानता है चूहा नहीं जानता। निमित्तमुद्दिश्य हि य: प्रकुप्यति, ध्रुवं स तस्यापगमे प्रसीदति । अकारणद्वेषि मनस्तु यस्य वै,कथं जनस्तं परितोषयिष्यति ॥3॥ निश्चय से जो किसी कारण से अत्यधिक क्रोध करता है, निश्चित रूप से वह उस कारण के समाप्त होने (मिट जाने) पर प्रसन्न भी हो जाता है। परन्तु जिसका मन बिना किसी कारण के किसी से द्वेष करता है, उस मनुष्य को कौन संतुष्ट कर सकता है।



उदीरितोऽर्थ: पशुनापि गृह्यते, हयाश्च नागाश्च वहन्ति बोधिता: । अनुक्तमप्यूहति पण्डितो जन:, परेङि्गतज्ञानफला हि बुद्धय: ॥4॥ कहा हुआ अर्थ (मतलब/संकेत) पशु के द्वारा भी ग्रहण कर लिया जाता है, घोड़े और हाथी भी कहे जाने पर ले जाते हैं।विद्वान बिना कहे ही बात का अंदाजा लगा लेता है क्योंकि बुद्धि दूसरों के संकेत से उत्पन्न ज्ञान रूपी फल वाली होती है। क्रोधो हि शत्रु: प्रथमो नराणां, देहस्थितो देहविनाशनाय । यथास्थित: काष्ठगतो हि वह्नि:, स एव वह्निर्दहते शरीरम्‌ ॥5॥ निश्चय से मनुष्यों के शरीर में रहने वाला क्रोध शरीर को नष्ट करने के लिए (उनका) पहला शत्रु है। जैसे लकड़ी में स्थित आग उसे जलाने का कारण होती है, वही क्रोध रूपी आग शरीर को भी जलाती है। मृगा मृगै: सङ्गमनुव्रजन्ति, गावश्च गोभि: तुरगास्तुरङ्गैः । मूर्खाश्च मूर्खै: सुधिय: सुधीभि:, समान-शील-व्यसनेषु सख्यम्‌ ॥6॥ मृग (हिरण) मृगों (हिरणों) के साथ पीछे-पीछे चलते हैं। गाएँ गायों के साथ, घोड़े-घोड़ों के साथ, मूर्ख मूर्खों के साथ तथा बुद्धिमान बुद्धिमानों के साथ जाते हैं। समान व्यवहार और स्वभाव वालों में मित्रता होती है।



सेवितव्यो महावृक्ष: फलच्छायासमन्वित: ।
यदि दैवात्‌ फलं नास्ति छाया केन निवार्यते ॥7॥
फल और छाया से युक्त महान वृक्ष आश्रय (सहारा) लेने योग्य होता है। यदि भाग्यवश फल न भी हों तो भी छाया किस के द्वारा रोकी जा सकती है? अर्थात् किसी के द्वारा नहीं।

अमन्त्रमक्षरं नास्ति, नास्ति मूलमनौषधम्‌ ।
अयोग्य: पुरुष: नास्ति योजकस्तत्र दुर्लभ: ॥8॥
मन्त्र से रहित (हीन) अक्षर नहीं होता है। जड़ जड़ी-बूटियों से रहित नहीं होती है। योग्यता से रहित व्यक्ति वास्तविक पुरुष (इनसान) नहीं होता है। वहाँ गुणों को वस्तुओं-व्यक्तियों से जोड़ने वाला दुर्लभ होता है।

संपत्तौ च विपत्तौ च महतामेकरूपता ।
उदये सविता रत्तो रत्तश्स्तमये तथा ॥9॥
धनवान होने अथवा (और) धनहीन होने पर महान् लोगों की एकरूपता (एक जैसी कार्यशीलता) होती है। जैसे उदय होते समय पर सूर्य लाल रंग का होता है तथा अस्त होने के समय पर भी लाल रंग का होता है।

विचित्रे खलु संसारे नास्ति किञ्चिन्निरर्थकम्‌ ।
अश्वश्चेद्‌ धावने वीर: भारस्य वहने खर: ॥10॥
निश्चय से इस विचित्र (अनोखे) संसार में कुछ भी निरर्थक (बेकार) नहीं है।
क्योंकि यदि घोड़ा दौड़ने में उपयोगी (वीर) होता है तो गधा भार को उठाने में (ढोने) में उपयोगी होता है।

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