पाठ १ : स्वदेश
रचयिता: गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही' | सम्पूर्ण व्याख्या, भावार्थ एवं समग्र अभ्यास हल
- कवि परिचय: इस ओजस्वी कविता के रचयिता गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही' (1883-1972) हैं। इनका जन्म उत्तर प्रदेश के उन्नाव जनपद में हुआ था। इन्होंने ब्रजभाषा और खड़ी बोली दोनों में उत्कृष्ट साहित्य सृजन किया। सरकारी सेवा में रहते हुए इन्होंने 'त्रिशूल' उपनाम से भी ओजपूर्ण राष्ट्रीय कविताएँ लिखीं। 'त्रिशूल तरंग', 'राष्ट्रीय मंत्र' तथा 'कृषक क्रंदन' इनकी प्रमुख कृतियाँ हैं।
- केंद्रीय भाव: यह कविता एक प्रेरक आह्वान-गीत है, जो प्रत्येक नागरिक में देश-प्रेम, आत्म-बलिदान, कर्तव्यनिष्ठा और सामूहिक चेतना का संचार करती है।
- मुख्य संदेश: जिस मनुष्य के मन में अपनी मातृभूमि के प्रति अनुराग, समर्पण और कर्तव्य-बोध नहीं है, उसका जीवन व्यर्थ और पत्थर के समान संवेदनहीन है। मृत्यु निश्चित है, अतः देश-कल्याण के लिए सर्वस्व न्योछावर करना ही जीवन की सार्थकता है।
वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।
जो जीवित जोश जगा न सका, उस जीवन में कुछ सार नहीं।
जो चल न सका संसार-संग, उसका होता संसार नहीं।
जिसने साहस को छोड़ दिया, वह पहुँच सकेगा पार नहीं।
जिससे न जाति-उद्धार हुआ, होगा उसका उद्धार नहीं।
जो भरा नहीं है भावों से, बहती जिसमें रस-धार नहीं।
कवि कहते हैं कि जिस हृदय में अपनी जन्मभूमि के प्रति सच्चा प्रेम नहीं है, वह जीवित हृदय नहीं बल्कि पत्थर के समान संवेदनहीन और कठोर है। जो व्यक्ति समाज व देश में उत्साह और चेतना का संचार नहीं कर सकता, उसका जीवन निष्फल है। जो व्यक्ति दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाकर प्रगति के पथ पर नहीं चलता, यह समाज भी उसे भुला देता है। संकट के समय साहस छोड़ देने वाला कभी लक्ष्य के पार नहीं पहुँच सकता। जिसने अपने समाज व राष्ट्र के उत्थान के लिए प्रयास नहीं किया, उसका स्वयं का उद्धार भी संभव नहीं है। जिसके मन में राष्ट्र के प्रति कोमल और उदात्त भावनाएँ नहीं उमड़तीं, वह जड़वत है।
जिसकी मिट्टी में उगे बढ़े, पाया जिसमें दाना-पानी।
हैं माता-पिता बंधु जिसमें, हम हैं जिसके राजा-रानी।।
जिसने कि खजाने खोले हैं, नव रत्न दिये हैं लासानी।
जिस पर ज्ञानी भी मरते हैं, जिस पर है दुनिया दीवानी।।
उस पर है नहीं पसीजा जो, क्या है वह भू का भार नहीं।
जिस मातृभूमि की पवित्र मिट्टी में हम पले-बढ़े, जिसका अन्न-जल ग्रहण कर हम जीवित हैं, जहाँ हमारे माता-पिता और भाई-बंधु निवास करते हैं तथा जहाँ हम सब स्वाभिमान से राजा-रानी की भाँति विचरण करते हैं—उस देश ने हमारे लिए अपने अनमोल प्राकृतिक व सांस्कृतिक खजाने खोल दिए हैं और अतुलनीय नवरत्न (महान विभूतियाँ व संपदा) प्रदान किए हैं। जिस देश के ज्ञान और संस्कृति पर पूरा विश्व नतमस्तक है, ऐसे देश की सेवा और कल्याण के प्रति जिसका मन द्रवित नहीं होता, वह व्यक्ति वास्तव में इस धरती पर बोझ के समान है।
निश्चित है निस्संशय निश्चित, है जान एक दिन जाने को।
है काल-दीप जलता हरदम, जल जाना है परवानों को।।
सब कुछ है अपने हाथों में, क्या तोप नहीं तलवार नहीं।
वह हृदय नहीं है, पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।।
यह बात पूर्णतः निश्चित और असंदिग्ध है कि यह नश्वर शरीर एक दिन नष्ट होना ही है। काल रूपी दीपक निरंतर जल रहा है और जिस प्रकार परवाने लौ पर न्योछावर हो जाते हैं, उसी प्रकार मनुष्य को भी अपने देश की रक्षा व गौरव के लिए बलिदान होने को तत्पर रहना चाहिए। अपनी और अपने राष्ट्र की रक्षा का सामर्थ्य हमारे ही हाथों में है; हमारे पास तोप और तलवार (आत्मबल व साधन) की कोई कमी नहीं है। अतः जिसके मन में स्वदेश के लिए प्रेम नहीं, वह हृदय वस्तुतः पत्थर है।
१. ऐतिहासिक व राष्ट्रीय पृष्ठभूमि: यह कविता भारत के स्वाधीनता संग्राम की पृष्ठभूमि में देशवासियों में राष्ट्रीय स्वाभिमान, साहस और स्वतंत्रता की भावना जागृत करने के उद्देश्य से लिखी गई थी।
२. लाक्षणिक एवं रूपक सौंदर्य: 'काल-दीप' और 'परवाने' के सुंदर रूपक के माध्यम से कवि ने मातृभूमि पर प्राण न्योछावर करने को अमरत्व की संज्ञा दी है। 'हृदय का पत्थर होना' संवेदनहीनता का सटीक प्रतीक है।
३. काव्य शैली: कविता में खड़ी बोली का ओजपूर्ण रूप, वीर रस का प्रभाव और गेयता (लयबद्धता) अद्वितीय है।
(क) मेरी समझ से [पृष्ठ - 3]
1. "वह हृदय नहीं है पत्थर है" इस पंक्ति में हृदय के पत्थर होने से तात्पर्य है—
2. निम्नलिखित में से कौन-सा विषय इस कविता का मुख्य भाव है?
3. "हम हैं जिसके राजा-रानी" इस पंक्ति में 'हम' शब्द किसके लिए आया है?
4. कविता के अनुसार कौन-सा हृदय पत्थर के समान है?
(ख) मिलकर करें मिलान [पृष्ठ - 4]
| स्तंभ 1 (काव्य पंक्ति) | स्तंभ 2 (सही अर्थ / संदर्भ) |
|---|---|
| 1. जिसने साहस को छोड़ दिया, वह पहुँच सकेगा पार नहीं। | जिसने किसी कार्य को करने का साहस छोड़ दिया हो वह किसी लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकता। |
| 2. जो जीवित जोश जगा न सका, उस जीवन में कुछ सार नहीं। | जो स्वयं के साथ ही दूसरों को भी प्रेरित और उत्साहित नहीं कर सकते उनका जीवन निष्फल और अर्थहीन है। |
| 3. जिस पर ज्ञानी भी मरते हैं, जिस पर है दुनिया दीवानी। | जिस देश की ज्ञान-संपदा से समूचा विश्व प्रभावित है। |
| 4. सब कुछ है अपने हाथों में, क्या तोप नहीं तलवार नहीं। | जिस प्रकार युद्ध में तोप और तलवार की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार मनुष्य की प्रगति के लिए साहस और इच्छाशक्ति की आवश्यकता होती है। |
(ग) पंक्तियों पर चर्चा [पृष्ठ - 5]
(क) "निश्चित है निस्संशय निश्चित, है जान एक दिन जाने को। है काल-दीप जलता हरदम, जल जाना है परवानों को।।"
(ख) "सब कुछ है अपने हाथों में, क्या तोप नहीं तलवार नहीं। वह हृदय नहीं है, पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।।"
(ग) "जो भरा नहीं है भावों से, बहती जिसमें रस-धार नहीं। वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।"
(घ) सोच-विचार के लिए [पृष्ठ - 5]
(क) "हम हैं जिसके राजा-रानी" पंक्ति में राजा-रानी किसे और क्यों कहा गया है?
उत्तर: यहाँ 'राजा-रानी' देश के समस्त नागरिकों (हम भारतवासियों) को कहा गया है। ऐसा इसलिए कहा गया है क्योंकि हम एक स्वतंत्र एवं लोकतांत्रिक देश में रहते हैं, जहाँ की अमूल्य प्राकृतिक व सांस्कृतिक संपदा पर हम सभी का समान अधिकार और गौरवपूर्ण स्वामित्व है।
(ख) 'संसार-संग' चलने से आप क्या समझते हैं? जो व्यक्ति 'संसार-संग' नहीं चलता, संसार उसका क्यों नहीं हो पाता है?
उत्तर: 'संसार-संग' चलने का अर्थ है—समय और दुनिया के साथ कदम मिलाकर ज्ञान, विज्ञान, नैतिकता और प्रगति के पथ पर आगे बढ़ना। जो व्यक्ति समय के साथ अपनी सोच और कर्मों में सकारात्मक बदलाव नहीं लाता, वह पिछड़ जाता है और समाज में अपनी प्रासंगिकता खो देता है।
(ग) “उस पर है नहीं पसीजा जो/क्या है वह भू का भार नहीं।” पंक्ति से आप क्या समझते हैं? बताइए।
उत्तर: जिस देश ने हमें जन्म दिया, पालन-पोषण किया और सुख-सुविधाएँ दीं, उसकी दुर्दशा या आवश्यकता के समय जिसका मन करुणा, कृतज्ञता और देश-सेवा से द्रवित (पसीजता) नहीं होता, वह मनुष्य इस धरती पर केवल एक निष्प्रयोजन बोझ है।
(घ) कविता में देश-प्रेम के लिए बहुत-सी बातें आई हैं। आप 'देश-प्रेम' से क्या समझते हैं? बताइए।
उत्तर: देश-प्रेम का अर्थ केवल सीमाओं पर युद्ध लड़ना ही नहीं है, बल्कि अपने देश के संविधान और नियमों का पालन करना, राष्ट्रीय संपत्ति और पर्यावरण की रक्षा करना, साथी नागरिकों से भाईचारा रखना तथा अपने कार्य को पूरी ईमानदारी और निष्ठा से करना भी सच्चा देश-प्रेम है।
(ङ) यह रचना एक आह्वान गीत है जो हमें देश-प्रेम के लिए प्रेरित और उत्साहित करती है। इस रचना की अन्य विशेषताएँ ढूंढ़िए और लिखिए।
उत्तर: (1) सरल, प्रवाहमयी एवं ओजस्वी खड़ी बोली। (2) सुंदर अंत्यानुप्रास एवं लयात्मकता जो इसे सहज गेय बनाती है। (3) रूपक और दृष्टांतों (काल-दीप, परवाने) का अत्यंत प्रभावशाली प्रयोग।
(ङ) अनुमान और कल्पना से [पृष्ठ - 6]
(क) “जिसने कि खजाने खोले हैं" अनुमान करके बताइए कि इस पंक्ति में किस प्रकार के खजाने की बात की गई होगी?
उत्तर: यहाँ भारत की समृद्ध प्राकृतिक संपदा (नदियाँ, वन, खनिज, उपजाऊ भूमि) और अनमोल बौद्धिक, आध्यात्मिक व सांस्कृतिक ज्ञान-भंडार (वेद, उपनिषद, ग्रंथ आदि) के खजाने की बात की गई है।
(ख) "जिसकी मिट्टी में उगे बढ़े" पंक्ति में 'उगे-बढ़े' किसके लिए और क्यों कहा गया होगा?
उत्तर: 'उगे-बढ़े' देशवासियों तथा प्रकृति की वनस्पति/फसलों के लिए कहा गया है। जैसे बीज मिट्टी में अंकुरित होकर बड़ा वृक्ष बनता है, वैसे ही मनुष्य मातृभूमि की गोद में जन्म लेकर अन्न-जल से पोषित होकर बड़ा होता है।
(ग) "वह हृदय नहीं है पत्थर है" पंक्ति में 'हृदय' के लिए 'पत्थर' शब्द का प्रयोग क्यों किया गया होगा?
उत्तर: पत्थर कठोर, निर्जीव और भावनाहीन होता है। जिस व्यक्ति में स्वदेश के प्रति प्रेम, सहानुभूति और कृतज्ञता की भावना नहीं होती, उसका हृदय भी पत्थर की तरह संवेदनहीन मान लिया जाता है।
(घ) कल्पना कीजिए कि पत्थर आपको अपनी कथा बता रहा है...
उत्तर: पत्थर: "हे मानव! जब मैं ऊंचे पर्वतों से लुढ़ककर नदी की तेज धारा में बहा, तो लहरों के थपेड़ों ने मुझे तराश कर गोल और चिकना बना दिया। आज लोग मुझे मंदिर की मूर्ति या पुल की नींव में लगाकर अपना जीवन सुगम बनाते हैं।"
मैं: "हे पाषाण मित्र! तुम्हारा यह धैर्य और परोपकार हमें सिखाता है कि हर परिस्थिति में दृढ़ रहकर देश व समाज के निर्माण में सहयोग देना चाहिए।"
(ङ) देश के किन-किन संसाधनों या वस्तुओं आदि को संरक्षण की आवश्यकता है और क्यों?
उत्तर: जल-स्रोतों, वनों, स्वच्छ वायु, खनिज संपदा और ऐतिहासिक धरोहरों को संरक्षण की अत्यंत आवश्यकता है ताकि पर्यावरण संतुलित रहे और हमारी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित रह सके।
(च) कविता की रचना व आपकी कविता [पृष्ठ - 6-7]
(क) शब्दों के तुक मिलाने से कविता में क्या विशेष प्रभाव पड़ा है?
उत्तर: तुक मिलाने (Rhyming) से कविता में लय, प्रवाह, मधुरता और गेयता आती है, जिससे पाठक कविता को आसानी से गा और याद कर सकते हैं।
(ख) कविता को प्रभावशाली बनाने के लिए और क्या-क्या प्रयोग किए गए हैं?
उत्तर: कविता में ओजपूर्ण शब्दावली, मुहावरेदार भाषा, रूपक अलंकार, अनुप्रास तथा 'है' शब्द के आदि-प्रयोग द्वारा विशेष काव्यात्मक सौंदर्य का सृजन किया गया है।
"वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।
जो देश के काम न आ पाया, उस जीवन का उद्धार नहीं।
हम दीप जलाएँ निष्ठा के, हर कोने का अंधकार मिटे,
जिसके कण-कण पर शीश झुके, वतन प्राणों से प्यारा वही।"
(छ) भाषा की बात [पृष्ठ - 7-8]
(क) शब्द से जुड़े शब्द ('स्वदेश' से जुड़े शब्द-जाल):
(ख) विराम चिह्नों को समझें (योजक चिह्न के स्थान पर कारक चिह्न):
- "संसार-संग" ➔ संसार के संग
- "दाना-पानी" ➔ दाना और पानी
- "माता-पिता" ➔ माता और पिता
- "राजा-रानी" ➔ राजा और रानी
- "जाति-उद्धार" ➔ जाति का उद्धार
(ग) शब्द-मित्र ('है / हैं' का स्थान परिवर्तन और सौंदर्य बोध):
- काव्य पंक्ति: "हैं माता-पिता बंधु जिसमें" ➔ गद्य रूप: जिसमें माता-पिता और बंधु हैं।
- काव्य पंक्ति: "है जान एक दिन जाने को" ➔ गद्य रूप: जान एक दिन जाने को है।
- काव्य पंक्ति: "है काल-दीप जलता हरदम" ➔ गद्य रूप: काल-दीप हरदम जलता है।
निष्कर्ष: 'है/हैं' को पंक्ति के प्रारंभ में लगाने से कविता में अद्भुत लय, झंकार और ओजस्विता उत्पन्न होती है।
(घ) समानार्थी शब्द तालिका [पृष्ठ - 8]:
| मूल शब्द | समानार्थी शब्द - १ | समानार्थी शब्द - २ |
|---|---|---|
| दीप | दीपक | प्रदीप |
| हृदय | दिल | जी / हिया |
| तलवार | असि | कृपाण |
| दुनिया | जग | संसार |
| पत्थर | पाषाण | पाहन |
| भू | धरा | पृथ्वी |
(ज) कविता का शीर्षक एवं आपकी बात [पृष्ठ - 8-10]
📌 नया शीर्षक: यदि मुझे नया शीर्षक चुनना हो, तो मैं "जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं" या "सच्चा राष्ट्रप्रेम" चुनूँगा, क्योंकि यह पंक्ति पूरी कविता का मूल मर्म स्पष्ट करती है।
- पौधों को पानी देना / पर्यावरण रक्षा (✔): प्रकृति व पर्यावरण का संवर्धन देश की अमूल्य सेवा है।
- रेल/सार्वजनिक स्थान पर कचरा फेंकना (✖): यह स्वदेश-प्रेम नहीं बल्कि राष्ट्रीय संपत्ति को गंदा करना है।
- खेल में देश का प्रतिनिधित्व करना (✔): खेल भावना से देश का नाम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रोशन होता है।
- आग बुझाने व संकट में सहायता (✔): देश के नागरिकों की विपत्ति में रक्षा करना सच्चा राष्ट्रधर्म है।
- सैनिक का सम्मान करना (✔): देश के रक्षकों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करना देश-प्रेम का प्रतीक है।
- स्वच्छता अभियान / कचरा उठाना (✔): अपने आस-पास सफाई रखना राष्ट्र की गरिमा बढ़ाता है।
- खेत में अन्न उपजाना (✔): किसान देश के भरण-पोषण की रीढ़ हैं।
- बुजुर्गों को सड़क पार कराना (✔): समाज के वरिष्ठ नागरिकों की सेवा सामाजिक समरसता को दर्शाती है।
- स्मारकों पर नाम लिखना (✖): ऐतिहासिक धरोहरों को विकृत करना गलत और अशोभनीय कृत्य है।
- राष्ट्रध्वज के समक्ष राष्ट्रगान गाना (✔): राष्ट्रीय प्रतीकों का आदर राष्ट्रभक्ति की सर्वोच्च अभिव्यक्ति है।
- बैंक/कार्यालय में कतार में अनुशासन बनाए रखना (✔): नागरिक नियमों और व्यवस्था का सम्मान करना।
- कार्यालय में खाली कमरे में पंखे/एसी बंद करना (✔): देश की ऊर्जा/बिजली की बचत करना भी देश-सेवा है।
(झ) विविध विमर्श एवं सह-अध्ययन [पृष्ठ - 11-12]
| विद्यार्थी | कलम, ज्ञान, पुस्तकें, अनुशासन और एकाग्रता |
| अध्यापक | सद्ज्ञान, शिक्षण, नैतिक मूल्य और मार्गदर्शन |
| कृषक | हल, ट्रैक्टर, कुदाल, पसीना और अन्न-उपज |
| चिकित्सक | स्टेथोस्कोप, औषधियाँ, चिकित्सा ज्ञान और सेवा-भाव |
| वैज्ञानिक | अनुसंधान, तर्क, तकनीकी उपकरण और नवोन्मेष (Invention) |
| श्रमिक | परिश्रम, औजार और निष्ठा |
| पत्रकार | सत्य, लेखनी, माइक, निष्पक्षता और अभिव्यक्ति |
कब प्रसन्न: जब हम ईमानदारी से पढ़ाई करते हैं, किसी जरूरतमंद की मदद करते हैं, सफाई रखते हैं और एकता का परिचय देते हैं।
कब उदास: जब हम सार्वजनिक स्थानों पर गंदगी फैलाते हैं, बिजली/पानी व्यर्थ बहाते हैं, किसी से झगड़ते हैं या नियमों का उल्लंघन करते हैं।
जहाँ गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही' की 'स्वदेश' कविता प्रत्यक्ष त्याग, शौर्य और ओजस्वी चेतना से देश-प्रेम प्रकट करती है, वहीं सोहनलाल द्विवेदी का 'खादी गीत' स्वावलंबन, स्वदेशी वस्तुओं के प्रयोग और चरखे के माध्यम से अहिंसक राष्ट्रभक्ति व आत्म-सम्मान को जागृत करता है। दोनों ही रचनाएँ स्वाधीनता संग्राम की अमर प्रेरणाएँ हैं।
१. कठिन शब्दार्थ एवं वाक्य प्रयोग तालिका
| क्र.सं. | कठिन शब्द | अर्थ | वाक्य प्रयोग |
|---|---|---|---|
| 1 | स्वदेश | अपना देश / मातृभूमि | हमें अपने स्वदेश की रक्षा हेतु सदैव तत्पर रहना चाहिए। |
| 2 | सार | अर्थ / निचोड़ / महत्त्व | परोपकार के बिना मानव जीवन में कोई सार नहीं है। |
| 3 | उद्धार | कल्याण / मुक्ति / उत्थान | शिक्षा ही समाज का उद्धार कर सकती है। |
| 4 | लासानी | बेमिसाल / अद्वितीय / जिसकी कोई सानी न हो | भारतीय संस्कृति की धरोहर लासानी है। |
| 5 | पसीजना | द्रवित होना / दया उत्पन्न होना | दीन-दुखियों की पुकार सुनकर सज्जनों का हृदय पसीज जाता है। |
| 6 | भू का भार | धरती पर बोझ | अकर्मण्य और देशद्रोही व्यक्ति भू का भार होता है। |
| 7 | निस्संशय | संदेह रहित / निश्चित रूप से | कठिन परिश्रम से निस्संशय सफलता मिलती है। |
| 8 | काल-दीप | मृत्यु / समय रूपी दीपक | संसार में काल-दीप निरंतर जल रहा है। |
| 9 | परवाना | पतंगा (यहाँ अर्थ: देश पर मर-मिटने वाला बलिदानी) | भगत सिंह जैसे परवाने राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए हंसते-हंसते शहीद हो गए। |
२. विलोम एवं पर्यायवाची शब्द सारणी
| शब्द | विलोम शब्द | पर्यायवाची शब्द |
|---|---|---|
| स्वदेश | परदेश, विदेश | मातृभूमि, जन्मभूमि, वतन |
| जीवित | मृत, निर्जीव | सजीव, जिंदा, प्राणवान |
| साहस | कायरता, भय | हिम्मत, वीरता, पराक्रम |
| ज्ञानी | अज्ञानी, मूर्ख | विद्वान, मनीषी, पंडित |
| निश्चित | अनिश्चित, संदिग्ध | तय, असंदिग्ध, पक्का |
३. संधि, समास, उपसर्ग एवं प्रत्यय सारणी
| घटक का प्रकार | शब्द / पद | विच्छेद / विग्रह / विश्लेषण |
|---|---|---|
| संधि | निस्संशय उद्धार | निः + संशय (विसर्ग संधि) उत् + हार (व्यंजन संधि) |
| समास | माता-पिता काल-दीप जाति-उद्धार | माता और पिता (द्वंद्व समास) काल रूपी दीप (कर्मधारय समास) जाति का उद्धार (तत्पुरुष समास) |
| उपसर्ग | स्वदेश अन्यायी | स्व (उपसर्ग) + देश (मूल शब्द) अन् (उपसर्ग) + न्याय (मूल शब्द) + ई (प्रत्यय) |
| प्रत्यय | दीवानी भारतीय | दीवाना + ई (प्रत्यय) भारत + ईय (प्रत्यय) |
४. पाठ में प्रयुक्त मुहावरे
| मुहावरा | अर्थ | वाक्य प्रयोग |
|---|---|---|
| हृदय पत्थर होना | अत्यंत कठोर व संवेदनहीन होना | अनाथ बच्चों का दुःख देखकर भी जिसका मन न पिघले, उसका हृदय पत्थर है। |
| भू का भार होना | व्यर्थ अथवा बोझ के समान होना | जो व्यक्ति देश और समाज के काम न आए, वह भू का भार है। |
| परवाना होना / मिटना | न्योछावर होना / आत्म-बलिदान देना | वीर सैनिक मातृभूमि की रक्षा के लिए परवाने बनकर प्राण त्याग देते हैं। |

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