पाठ २ : दो गौरैया
लेखक: भीष्म साहनी | सम्पूर्ण व्याख्या, हास्य-व्यंग्य विश्लेषण एवं समग्र अभ्यास हल
- लेखक परिचय: इस आत्मीय एवं मनोरंजक कहानी के लेखक भीष्म साहनी (1915–2003) हैं। वे हिन्दी साहित्य के मूर्धन्य कथाकार व नाटककार थे। उनके सुप्रसिद्ध उपन्यास 'तमस' पर उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार प्रदान किया गया था। भारत सरकार ने उन्हें 'पद्म भूषण' से अलंकृत किया। बच्चों के लिए भी उन्होंने कई प्रसिद्ध कहानियाँ जैसे 'गुलेल का खेल' आदि लिखी हैं।
- केंद्रीय भाव: 'दो गौरैया' मनुष्य और प्रकृति (पशु-पक्षियों) के बीच सह-अस्तित्व, वात्सल्य, संवेदना और आत्मीयता की सुंदर अभिव्यक्ति है। यह दिखाती है कि क्रोध और अहंकार पर प्रेम और ममता की विजय कैसे होती है।
- मुख्य संदेश: धरती केवल मनुष्य की नहीं, सभी प्राणियों की है। पशु-पक्षी भी परिवार, संतान-स्नेह और घर का महत्त्व भली-भाँति समझते हैं। उनके प्रति क्रूरता के स्थान पर सहिष्णुता, करुणा और आदर का भाव रखना चाहिए।
"घर में हम तीन ही व्यक्ति रहते हैं— माँ, पिताजी और मैं। पर पिताजी कहते हैं कि यह घर सराय बना हुआ है। हम तो जैसे यहाँ मेहमान हैं, घर के मालिक तो कोई दूसरे ही हैं। आँगन में आम का पेड़ है... यहाँ कभी तोते पहुँच जाते हैं, तो कभी कौवे और कभी तरह-तरह की गौरैयाँ। घर के अंदर भी यही हाल है। बीसियों तो चूहे बसते हैं... बिल्ली हमारे घर में रहती तो नहीं मगर घर उसे भी पसंद है और वह कभी-कभी झाँक जाती है... अब एक दिन दो गौरैया सीधी अंदर घुस आईं और बिना पूछे उड़-उड़कर मकान देखने लगीं..."
लेखक के घर में तरह-तरह के जीव-जंतु (तोते, कौवे, चूहे, बिल्ली, चमगादड़, चींटियाँ) स्वच्छंद रूप से रहते हैं, जिससे पिताजी को लगता है कि घर मनुष्य का न होकर कोई सराय बन गया है। इसी बीच दो गौरैयाँ बैठक में पंखे के ऊपर अपना घोंसला बना लेती हैं।
"इस पर पिताजी को गुस्सा आ गया... बोले, 'देखता हूँ ये कैसे यहाँ रहती हैं! गौरैयाँ मेरे आगे क्या चीज़ हैं! मैं अभी निकाल बाहर करता हूँ।' 'छोड़ो जी, चूहों को तो निकाल नहीं पाए, अब चिड़ियों को निकालेंगे!' माँ ने व्यंग्य से कहा... पिताजी लाठी उठाए पर्दे के डंडे की ओर लपके... उन्होंने दरवाजों के नीचे कपड़े ठूँस दिए... पर थोड़ी ही देर बाद वे फिर कमरे में मौजूद थीं।"
पिताजी गौरैयों को भगाने के लिए ताली बजाते हैं, कूदते हैं, लाठी घुमाते हैं और दरवाजे-रोशनदान बंद करते हैं, किंतु गौरैयाँ हर बार किसी न किसी रास्ते से वापस आ जाती हैं। माँ के व्यंग्य और चिड़ियों की अदम्य जिजीविषा पिताजी के प्रयासों को बार-बार निष्फल कर देती है।
"पिताजी ने लाठी का सिरा सूखी घास के तिनकों पर जमाया और दाईं ओर को खींचा... तभी सहसा जोर की आवाज आई, 'चीं-चीं, चीं-चीं!!!' पंखे के गोले के ऊपर से नन्हीं-नन्हीं गौरैयाँ सिर निकाले नीचे की ओर देख रही थीं... मैंने देखा, पिताजी स्टूल पर से नीचे उतर आए हैं और घोंसले के तिनकों में से लाठी निकालकर उन्होंने लाठी को एक ओर रख दिया है और चुपचाप कुर्सी पर आकर बैठ गए हैं... उनके माँ-बाप झट-से उड़कर अंदर आ गए और नन्हीं-नन्हीं चोंचों में चुग्गा डालने लगे... अबकी बार पिताजी उनकी ओर देख-देखकर केवल मुसकराते रहे।"
जब पिताजी घोंसला तोड़ने लगते हैं, तभी घोंसले से नवजात नन्हें बच्चों की पुकार सुनाई देती है। उस नन्हें जीवन और वात्सल्य भाव को देखकर पिताजी का कठोर मन पिघल जाता है। वे लाठी रख देते हैं और चिड़ियों के परिवार को अपने घर का अभिन्न अंग स्वीकार कर लेते हैं।
१. मानवीकरण एवं हास्य-व्यंग्य: भीष्म साहनी जी ने पशु-पक्षियों के क्रियाकलापों का मानवीकरण (Personification) किया है—जैसे चूहे को बूढ़ा समझकर सर्दी लगना, बिल्ली का 'फिर आऊँगी' कहना आदि।
२. पारिवारिक संवादों की सहजता: माँ और पिताजी के बीच की नोक-झोंक कहानी में अत्यंत स्वाभाविक और सुरुचिपूर्ण पारिवारिक हास्य का सृजन करती है।
३. संवेदनशीलता का संदेश: यह कहानी बाल-मन को प्रकृति, पर्यावरण और नन्हें मूक जीवों के प्रति संवेदनशील, दयालु और सहिष्णु बनाने की सुंदर सीख देती है।
(क) मेरी समझ से [पृष्ठ - 19-20]
(1) पिताजी ने कहा कि घर सराय बना हुआ है क्योंकि—
(2) कहानी में 'घर के असली मालिक' किसे कहा गया है?
(3) गौरैयों के प्रति माँ और पिताजी की प्रतिक्रियाएँ कैसी थीं?
(4) माँ बार-बार पिताजी की बातों पर मुसकराती और मजाक करती थीं। इससे क्या पता चलता है?
(5) कहानी में गौरैयों के बार-बार लौटने को जीवन के किस पहलू से जोड़ा जा सकता है?
(ख) मिलकर करें मिलान [पृष्ठ - 20]
| वाक्य (पाठ से) | सबसे उपयुक्त अर्थ |
|---|---|
| 1. वह शोर मचता है कि कानों के पर्दे फट जाएँ, पर लोग कहते हैं कि पक्षी गा रहे हैं! | पिताजी को पक्षियों का चहकना शोर जैसा लगता था लेकिन लोगों को वह संगीत जैसा लगता था। |
| 2. आँगन में आम का पेड़ है। तरह-तरह के पक्षी उस पर डेरा डाले रहते हैं। | आम के पेड़ पर अलग-अलग प्रकार के पक्षी हर समय निवास करते हैं। |
| 3. वह धमा-चौकड़ी मचती है कि हम लोग ठीक तरह से सो भी नहीं पाते। | चूहों की भागदौड़ और शोर इतना होता है कि घर के लोग चैन से सो नहीं पाते। |
| 4. वह समझते हैं कि माँ उनका मजाक उड़ा रही हैं। | पिताजी को ऐसा भ्रम होने लगता है कि माँ उनकी चेष्टाओं का उपहास कर रही हैं। |
| 5. पिताजी ने लाठी दीवार के साथ टिकाकर रख दी और छाती फैलाए कुर्सी पर आ बैठे। | पिताजी ने लाठी एक ओर रख दी और गर्व से, विजयी मुद्रा में बैठ गए। |
| 6. इतने में रात पड़ गई। | कहानी की घटनाओं के बीच धीरे-धीरे रात हो गई और अँधेरा छा गया। |
| 7. जब हम लोग नीचे उतरकर आए तो वे फिर से मौजूद थीं और मजे से बैठी मल्हार गा रही थीं। | गौरैयाँ फिर से लौट आई थीं और शांत व प्रसन्न भाव से चहचहा रही थीं जैसे कोई राग गा रही हों। |
(ग) पंक्तियों पर चर्चा [पृष्ठ - 21]
(क) "अब तो ये नहीं उड़ेंगी। पहले इन्हें उड़ा देते, तो उड़ जातीं। अब तो इन्होंने यहाँ घोंसला बना लिया है।"
(ख) "एक दिन अंदर नहीं घुस पाएँगी, तो घर छोड़ देंगी।"
(ग) "किसी को सचमुच बाहर निकालना हो, तो उसका घर तोड़ देना चाहिए।"
(घ) सोच-विचार के लिए [पृष्ठ - 21]
(क) आपको कहानी का कौन-सा पात्र सबसे अच्छा लगा और क्यों?
उत्तर: मुझे माँ का पात्र सबसे अच्छा लगा, क्योंकि वे अत्यधिक धैर्यवान, दयालु और विनोदी स्वभाव की हैं। वे जीवों के प्रति सहानुभूति रखती हैं और पिताजी के व्यर्थ क्रोध को हँसी-मजाक में टाल देती हैं।
(ख) लेखक के घर में चिड़िया ने अपना घोंसला कहाँ और क्यों बनाया?
उत्तर: गौरैयों ने बैठक की छत में लगे पंखे के ऊपर (गोले में) घोंसला बनाया, क्योंकि वह स्थान ऊँचाई पर था, सुरक्षित था और वहाँ बिल्ली या अन्य शिकारियों की पहुँच नहीं थी।
(ग) क्या पशु-पक्षी भी परिवार और घर का महत्व समझते हैं?
उत्तर: हाँ, बिल्कुल। कहानी में गौरैयाँ अपने अंडों और बच्चों की सुरक्षा के लिए जान जोखिम में डालकर भी बार-बार लौटीं और बच्चों के रोने पर तुरंत चुग्गा लेकर दौड़ी आईं। यह उनके परिवार-प्रेम को सिद्ध करता है।
(घ) “अब मैं हार मानने वाला आदमी नहीं हूँ।" से पिताजी के स्वभाव के कौन-से गुण उभरते हैं?
उत्तर: इससे उनका हठी, दृढ़-निश्चयी और स्वाभिमानी स्वभाव प्रकट होता है, हालाँकि अंत में उनका संवेदनशील और सहृदय रूप भी सामने आता है।
(ङ) गौरैयों के व्यवहार में कब और कैसा बदलाव आया?
उत्तर: जब पिताजी घोंसला तोड़ने लगे, तब गौरैयाँ बाहर दीवार पर चुपचाप, गुमसुम और सहमी हुई बैठ गईं। उनका चहकना और गाना बंद हो गया और वे दुबली व काली सी दिखने लगीं क्योंकि उनके बच्चों का आशियाना खतरे में था।
(च) गौरैयों ने किन-किन स्थानों से घर में प्रवेश किया था?
उत्तर: (1) मुख्य खुले दरवाजों से, (2) रसोई (किचन) के दरवाजे से, (3) बंद दरवाजों के नीचे की खाली जगह से, और (4) रोशनदान के टूटे शीशे से।
(छ) इस कहानी को कौन सुना रहा है? आपको यह कैसे पता चला?
उत्तर: इस कहानी को घर का बालक (स्वयं लेखक) सुना रहा है। यह बात पहली ही पंक्ति "घर में हम तीन ही व्यक्ति रहते हैं— माँ, पिताजी और मैं" तथा "पिताजी ने मुझे झिड़ककर कहा" से स्पष्ट होती है।
(ज) माँ बार-बार क्यों कह रही होंगी कि गौरैयाँ घर छोड़कर नहीं जाएँगी?
उत्तर: क्योंकि माँ को प्रकृति और पक्षियों के स्वभाव की गहरी समझ थी कि जब चिड़ियाँ अंडे दे देती हैं, तो वे अपनी संतान का मोह छोड़कर किसी भी परिस्थिति में स्थान नहीं बदलतीं।
(ङ) अनुमान और कल्पना से [पृष्ठ - 22]
(क) यदि आपके घर में चिड़ियाँ घोंसला बनाएँ तो आप क्या करेंगे?
उत्तर: हम उनके घोंसले को बिल्कुल नहीं छेड़ेंगे, बल्कि उनके लिए बालकनी में दाना और स्वच्छ पानी की व्यवस्था करेंगे और उनकी सुरक्षा का ध्यान रखेंगे।
(ख) अन्य प्राणियों के घुसने पर घर के लोगों का व्यवहार कैसा होगा?
उत्तर: तितली को देखकर बच्चे प्रसन्न होंगे; मच्छर, मक्खी और कॉकरोच को बीमारी के डर से दवा छिड़ककर भगाया जाएगा; कुत्ते-बिल्ली को पुचकार कर या डराकर बाहर निकाला जाएगा।
(ग) “मैं अवाक् उनकी ओर देखता रहा।" लेखक को हैरानी क्यों हुई?
उत्तर: लेखक को हैरानी घोंसले में से नन्हीं गौरैयों के सिर बाहर निकाल कर चीं-चीं करते देखकर हुई, और साथ ही पिताजी के अचानक हुए हृदय-परिवर्तन को देखकर वे अवाक् रह गए।
(घ) माँ ने गौरैयों को निकालने में पिताजी की सहायता क्यों नहीं की?
उत्तर: क्योंकि माँ के मन में चिड़ियों के प्रति दया और ममता थी, वे दिल से चाहती थीं कि चिड़ियाँ वहीं रहें और अंडे सुरक्षित रहें।
(च) सराय और घर में क्या अंतर होता है?
उत्तर: सराय एक सार्वजनिक विश्राम-स्थल है जहाँ कोई भी अपरिचित अस्थायी रूप से ठहरता है। घर एक निजी, आत्मीय और स्थायी निवास होता है जहाँ परिवार के सदस्य प्रेम और अपनेपन के साथ रहते हैं।
(च) संवाद, अभिनय एवं बदली कहानी [पृष्ठ - 22-23]
बच्चा १: "चीं-चीं! माँ, भूख लगी है! बाहर बहुत शोर हो रहा था, हमें डर लग रहा था!"
माँ गौरैया: "डरो मत मेरे बच्चों! हम तुम्हारे लिए दाना ले आए हैं। अब यहाँ कोई खतरा नहीं है, नीचे वाले बड़े इंसान अब हमारे मित्र बन गए हैं!"
यदि घोंसले में बच्चे न होते, तो पिताजी पूरा घोंसला नोचकर बाहर फेंक देते। गौरैयाँ उदास होकर कमरे से उड़ जातीं और आँगन के आम के पेड़ पर जाकर बैठ जातीं। कुछ दिन बाद वे आम के पेड़ की घनी डालियों में नया घोंसला बनातीं। घर में शांति तो हो जाती, किंतु बैठक का वह जीवंत उल्लास और चिड़ियों का मधुर संगीत सदा के लिए समाप्त हो जाता।
(छ) भाषा की बात : क्रिया-विशेषण एवं मात्रा-भेद [पृष्ठ - 23-24]
(१) क्रिया-विशेषण शब्दों से वाक्य निर्माण:
- झिड़ककर: दुकानदार ने भिखारी को झिड़ककर भगा दिया।
- गंभीरता से: डॉक्टर ने मरीज की स्थिति गंभीरता से जाँची।
- गुस्से में: अधिकारी ने गुस्से में फाइल मेज पर पटक दी।
- फुसफुसाते हुए: दोनों छात्र परीक्षा भवन के बाहर फुसफुसाते हुए बात कर रहे थे।
- सहमकर: धमाके की आवाज सुनकर बालक कोने में सहमकर बैठ गया।
(२) मात्रा के हेर-फेर से अर्थ-परिवर्तन एवं वाक्य प्रयोग [पृष्ठ - 24]:
| पिता / पीता | पिता: मेरे पिता एक शिक्षक हैं। पीता: रोहन रोज सुबह ताजा दूध पीता है। |
| हार / हरा / हारा | हार: फूलों का सुंदर हार। / हरा: तोते का रंग हरा है। / हारा: वह मैच में हारा नहीं। |
| नीचा / नीचे | नीचा: किसी को नीचा न दिखाओ। नीचे: बिल्ली मेज के नीचे बैठी है। |
| सहसा / साहस | सहसा: सहसा तेज वर्षा होने लगी। साहस: संकट में साहस से काम लो। |
(ज) कहानी की रचना एवं विशेषताएँ [पृष्ठ - 25]
| कहानी की विशेषता | कहानी में से उदाहरण |
|---|---|
| 1. बात को बढ़ा-चढ़ाकर कहना | जो भी पक्षी दिल्ली पहुँचता है, वही सीधा हमारे घर आता है जैसे घर का पता लिखवाकर लाया हो। |
| 2. हास्य-व्यंग्य का उपयोग | "छोड़ो जी, चूहों को तो निकाल नहीं पाए, अब चिड़ियों को निकालेंगे!" |
| 3. सोचा कुछ और, हुआ कुछ और | पिताजी ने सोचा कि चिड़ियाँ हार मानकर चली गईं, पर सुबह वे मजे से मल्हार गा रही थीं। |
| 4. मन के भावों का अनुमान | "चिड़ियाँ पूछ रही हैं कि यह आदमी कौन है और नाच क्यों रहा है?" |
| 5. जीव को अन्य नाम/संज्ञा देना | चींटियों की फौज को "छावनी डाले हुए" और चूहे को "बूढ़ा" कहना। |
(झ) झरोखे से एवं पूरक पठन [पृष्ठ - 26-35]
शहरीकरण, पक्के कंक्रीट के मकानों और कीटनाशकों के कारण गौरैया की संख्या तेजी से घट रही है। इनकी रक्षा और जन-जागरूकता के लिए प्रतिवर्ष 20 मार्च को 'विश्व गौरैया दिवस' मनाया जाता है।
पंचतंत्र की यह प्रसिद्ध कथा सिखाती है कि सच्ची मित्रता में अपार शक्ति होती है। चार स्वाभाविक विरोधी और भिन्न प्राणी—लघुपतनक (कौआ), हिरण्यक (चूहा), मन्थरक (कछुआ) और चित्रांग (हिरन)—अपनी अटूट मैत्री, सूझबूझ और सहयोग से शिकारी (व्याध) के चंगुल से एक-दूसरे के प्राण बचाते हैं।
१. कठिन शब्दार्थ तालिका
| क्र.सं. | कठिन शब्द | अर्थ | वाक्य प्रयोग |
|---|---|---|---|
| 1 | सराय | मुसाफिरखाना / धर्मशाला | यात्रियों ने रात बिताने के लिए सराय में शरण ली। |
| 2 | डेरा डालना | अस्थायी रूप से बसना / ठहरना | साधुओं की टोली ने नदी किनारे डेरा डाल दिया। |
| 3 | धमा-चौकड़ी | उछल-कूद / हुड़दंग | छुट्टी होते ही बच्चों ने मैदान में धमा-चौकड़ी मचा दी। |
| 4 | निरीक्षण | जाँच-पड़ताल / भली-भाँति देखना | प्रधानाचार्य ने विद्यालय परिसर का निरीक्षण किया। |
| 5 | अवाक् | हैरान / निशब्द / चकित | जादू का खेल देखकर दर्शक अवाक् रह गए। |
| 6 | ठिठकना | अचानक रुक जाना / सहम जाना | अँधेरे में आहट सुनकर मेरे कदम ठिठक गए। |
| 7 | चुग्गा | पक्षियों का दाना / भोजन | चिड़िया अपने बच्चों की चोंच में चुग्गा डाल रही थी। |
२. विलोम एवं पर्यायवाची शब्द सारणी
| शब्द | विलोम शब्द | पर्यायवाची शब्द |
|---|---|---|
| मेहमान | मेजबान | अतिथि, अभ्यागत, पाहुना |
| मालिक | नौकर, सेवक | स्वामी, प्रभु, अधिपति |
| गुस्सा | शांत, प्रसन्नता | क्रोध, कोप, रोष |
| पक्षी | - | खग, विहग, पखेरू, पंछी |
| घर | बेघर | गृह, सदन, आलय, निकेतन |
३. संधि, समास, उपसर्ग एवं प्रत्यय सारणी
| घटक का प्रकार | शब्द / पद | विच्छेद / विग्रह / विश्लेषण |
|---|---|---|
| संधि | निरीक्षण सूर्योदय | निः + ईक्षण (विसर्ग संधि) सूर्य + उदय (गुण स्वर संधि) |
| समास | माँ-बाप रात-भर रोशनदान | माँ और बाप (द्वंद्व समास) पूरी रात (अव्ययीभाव समास) रोशनी के लिए दान/स्थान (तत्पुरुष) |
| उपसर्ग | प्रतिक्रिया अवाक् | प्रति (उपसर्ग) + क्रिया अ (उपसर्ग) + वाक् |
| प्रत्यय | सहनशीलता गंभीरता | सहनशील + ता (प्रत्यय) गंभीर + ता (प्रत्यय) |
४. पाठ में प्रयुक्त मुहावरे
| मुहावरा | अर्थ | वाक्य प्रयोग |
|---|---|---|
| कानों के पर्दे फटना | अत्यधिक तीव्र शोर होना | डीजे की तेज आवाज से कानों के पर्दे फटने लगे। |
| उबल पड़ना | अत्यधिक क्रोधित हो जाना | झूठी शिकायत सुनते ही पिताजी उबल पड़े। |
| मल्हार गाना | खुशी व मस्ती में चहकना/गीत गाना | परीक्षा समाप्त होते ही बच्चे मजे से मल्हार गाने लगे। |
| पिल पड़ना / टूट पड़ना | पूरी शक्ति से पीछे पड़ जाना | पिताजी लाठी लेकर गौरैयों पर पिल पड़े। |

0 टिप्पणियाँ