संस्कृत-व्याकरणम् | प्रकरणम् - शब्दरूप-विचारः
शब्दरूप-परिचयः एवं सुप्-प्रत्यय-संरचना
अजन्त (स्वरान्त) एवं हलन्त (व्यञ्जनान्त) शब्दरूप-साधना तथा पद-विमर्श
१. शब्द एवं पद परिचयः [प्रकरण - १]
वर्ण एवं शब्द: भाषा की सबसे छोटी इकाई 'वर्ण' कहलाती है। वर्णों के सार्थक योग से 'शब्द' का निर्माण होता है। भाषा में शब्दों के अनेक रूप होते हैं—यथा संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण आदि।
पद-निर्माण: संस्कृत भाषा में स्वतंत्र शब्दों का सीधा प्रयोग वाक्य में नहीं होता; उन्हें 'पद' बनाना अनिवार्य होता है। संज्ञा एवं सर्वनाम आदि शब्दों को पद बनाने के लिए उनमें प्रथमा, द्वितीया आदि विभक्तियों का योग किया जाता है।
शब्दरूप: इन शब्दरूपों का प्रयोग तीनों लिङ्गों (पुल्लिंग, स्त्रीलिंग, नपुंसकलिंग) तथा तीनों वचनों (एकवचन, द्विवचन, बहुवचन) में भिन्न-भिन्न रूपों में होता है। इन्हीं रूपों के व्यवस्थित समूह को 'शब्दरूप' कहा जाता है।
पाणिनीय-सूत्रम्: "सुप्तिङन्तं पदम्" (अष्टाध्यायी १.४.१४)
सूत्रार्थ: 'सुप्' (२१ नाम-प्रत्यय) अथवा 'तिङ्' (१८ क्रिया-प्रत्यय) जिसके अन्त में जुड़े हों, व्याकरण शास्त्र में उसी की 'पद' संज्ञा होती है। अर्थात् बिना सुप् प्रत्यय जोड़े कोई भी प्रातिपदिक (संज्ञा/सर्वनाम) संस्कृत वाक्य में प्रयुक्त होने योग्य नहीं होता।
२. एकविंशतिः (२१) सुप्-प्रत्यय सारणी [प्रकरण - २]
शब्दरूपों में प्रयुक्त होने वाली सात विभक्तियों के तीनों वचनों में रूपों के निष्पादन हेतु महर्षि पाणिनि द्वारा २१ सुप्-प्रत्ययों का विधान किया गया है:
| विभक्ति |
एकवचन |
द्विवचन |
बहुवचन |
| प्रथमा |
सु (स् → :) |
औ |
जस् (अस्) |
| द्वितीया |
अम् |
औट् (औ) |
शस् (अस्) |
| तृतीया |
टा (आ) |
भ्याम् |
भिस् (भिः) |
| चतुर्थी |
ङे (ए) |
भ्याम् |
भ्यस् (भ्यः) |
| पञ्चमी |
ङसिँ (अस्) |
भ्याम् |
भ्यस् (भ्यः) |
| षष्ठी |
ङस् (अस्) |
ओस् (ओः) |
आम् |
| सप्तमी |
ङि (इ) |
ओस् (ओः) |
सुप् (सु/षु) |
३. शब्द-वर्गीकरणम्: स्वरान्त एवं व्यञ्जनान्त [प्रकरण - ३]
१. स्वरान्त (अजन्त) शब्द
जिन शब्दों के अन्त में स्वर वर्ण (अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ आदि) होते हैं, उन्हें स्वरान्त या अजन्त कहते हैं।
यथा: बालक (अकारान्त), लता (आकारान्त), कवि/मति (इकारान्त), नदी (ईकारान्त), गुरु/भानु (उकारान्त), पितृ/मातृ (ऋकारान्त)।
२. व्यञ्जनान्त (हलन्त) शब्द
जिन शब्दों के अन्त में व्यञ्जन वर्ण (त्, न्, स्, च् आदि) होते हैं, उन्हें व्यञ्जनान्त या हलन्त कहते हैं।
यथा: राजन् (नकारान्त), श्रीमत्/भवत् (तकारान्त), जगत् (तकारान्त), चन्द्रमस् (सकारान्त), वाच् (चकारान्त)।
विशेष व्याकरण नियम (इत्-संज्ञा एवं आदेश):
सुप्-प्रत्ययों में अनुबन्ध लोप (इत्-संज्ञा) होने के पश्चात् ही मूल रूप शेष रहता है। जैसे—'सु' में 'उ' की इत्-संज्ञा होकर केवल 'स्' बचता है, जो विसर्ग (:) में बदल जाता है। इसी प्रकार 'टा' में 'आ', 'ङे' में 'ए', 'ङसिँ' व 'ङस्' में 'अस्' तथा 'ङि' में 'इ' शेष रहता है।
४. रूप-साधना / पद-विश्लेषण सारणी [प्रकरण - ४]
| क्र.सं. |
मूल प्रातिपदिक |
विभक्ति एवं वचन |
सुप् प्रत्यय योग (सिद्धि चरण) |
निष्पन्न पद |
| १. |
बालक (अकारान्त पुं.) |
प्रथमा, एकवचन |
बालक + सु (स् → विसर्ग) |
बालकः |
| २. |
लता (आकारान्त स्त्री.) |
तृतीया, बहुवचन |
लता + भिस् (भिः) |
लताभिः |
| ३. |
फल (अकारान्त नपुं.) |
प्रथमा/द्वितीया, बहुवचन |
फल + जस्/शस् (शि आदेश + नुम्) |
फलानि |
| ४. |
अस्मद् (सर्वनाम) |
षष्ठी, बहुवचन |
अस्मद् + आम् (अस्माकम् आदेश) |
अस्माकम् |
| ५. |
भवत् (हलन्त पुं.) |
सप्तमी, बहुवचन |
भवत् + सुप् (सु) |
भवत्सु |
५. प्रमुख शब्दरूप अध्ययन-सूची [Quick Access Directory]
विद्यार्थियों की सुविधा के लिए महत्वपूर्ण संज्ञा एवं सर्वनाम शब्दरूपों के पृष्ठ नीचे दिए गए हैं। सम्बंधित लिंक पर क्लिक करके विस्तृत रूप देखें:
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