पाठ ४ : हरिद्वार
लेखक: भारतेंदु हरिश्चंद्र ('कविवचन सुधा' पत्र-वृत्तांत) | सम्पूर्ण व्याख्या एवं समग्र अभ्यास हल
- लेखक परिचय: आधुनिक हिन्दी साहित्य के जनक भारतेंदु हरिश्चंद्र (1850–1885) ने 'कविवचन सुधा', 'हरिश्चंद्र मैगजीन' व 'बालाबोधिनी' पत्रिकाओं का संपादन किया। इनकी प्रसिद्ध कृतियों में 'सत्य हरिश्चन्द्र', 'भारत-दुर्दशा', 'अंधेर नगरी' तथा 'सरयूपार की यात्रा' उल्लेखनीय हैं।
- केंद्रीय भाव: यह पाठ भारतेंदु जी द्वारा सन् 1871 ई. में 'कविवचन सुधा' के संपादक को लिखे गए एक पत्र के रूप में है, जिसमें हरिद्वार के प्राकृतिक सौंदर्य, गंगा की निर्मलता, सादगी और आध्यात्मिक वातावरण का सजीव वर्णन किया गया है।
- मुख्य संदेश: शिक्षा केवल पोथियों से नहीं बल्कि प्रत्यक्ष यात्राओं से पूर्ण होती है। प्रकृति के निकट सादगीपूर्ण जीवन सोने की थाली के वैभव से भी अधिक सुखदायी होता है।
"यह भूमि तीन ओर सुंदर हरे-हरे पर्वतों से घिरी है जिन पर्वतों पर अनेक प्रकार की वल्ली हरी-भरी सज्जनों के शुभ मनोरथों की भाँति फैलकर लहलहा रही है और बड़े-बड़े वृक्ष भी ऐसे खड़े हैं मानो एक पैर से खड़े तपस्या करते हैं और साधुओं की भाँति घाम, ओस और वर्षा अपने ऊपर सहते हैं। अहा! इनके जन्म भी धन्य हैं जिनसे अर्थी विमुख जाते ही नहीं। फल, फूल, गंध, छाया, पत्ते, छाल, बीज, लकड़ी और जड़; यहाँ तक कि जले पर भी कोयले और राख से लोगों का मनोरथ पूर्ण करते हैं। सज्जन ऐसे कि पत्थर मारने से फल देते हैं..."
हरिद्वार तीन ओर से प्राकृतिक पर्वतों से घिरा है। यहाँ की लताएँ सज्जनों की शुभ इच्छाओं की तरह फैली हैं और वृक्ष तपस्वी साधुओं की तरह अडिग रहकर धूप, ठंड और वर्षा सहते हुए सभी याचक मनुष्यों का कल्याण करते हैं। वृक्षों का सम्पूर्ण अस्तित्व परोपकार के लिए समर्पित है।
"एक ओर त्रिभुवन पावनी श्री गंगा जी की पवित्र धारा बहती है जो राजा भगीरथ के उज्ज्वल कीर्ति की लता-सी दिखाई देती है। जल यहाँ का अत्यंत शीतल है और मिष्ट भी वैसा ही है मानो चीनी के पने को बरफ में जमाया है... एक दिन मैंने श्री गंगा जी के तट पर रसोई करके पत्थर ही पर जल के अत्यंत निकट परोसकर भोजन किया। जल के छलके पास ही ठंढे-ठंढे आते थे। उस समय के पत्थर पर का भोजन का सुख सोने की थाल के भोजन से कहीं बढ़ के था।"
गंगाजल बर्फ जैसा शीतल और शर्बत जैसा मीठा है। लेखक ने गंगा तट पर स्वयं भोजन बनाकर पत्थरों पर परोसकर ग्रहण किया। गंगा की ठंडी फुहारों के बीच प्रकृति की गोद में मिला वह सादगीपूर्ण भोजन किसी राजसी स्वर्ण थाल के भोजन से कहीं अधिक आत्मिक तृप्ति और परमानंद देने वाला था।
१. 150 वर्ष पुरानी खड़ी बोली का स्वरूप: इस पत्र में भारतेन्दु युग की आरम्भिक गद्य-शैली के दर्शन होते हैं, जहाँ 'जात्रियों', 'शिषर', 'राने', 'पने', 'बिछायत' और 'स्थानदान' जैसे प्राचीन व तद्भव शब्द प्रयुक्त हुए हैं।
२. उपमा व रूपक सौंदर्य: लताओं की तुलना 'सज्जनों के मनोरथों' से, वृक्षों की 'साधुओं की तपस्या' से, गंगा की 'भगीरथ की कीर्ति-लता' से और शीतल जल की तुलना 'चीनी के पने' से की गई है।
३. पत्र-विधा में यात्रा-वृत्तांत: यह पाठ यात्रा-संस्मरण और पत्र-लेखन विधा का सुंदर समन्वय है।
(क) मेरी समझ से [पृष्ठ - 49-50]
1. "सज्जन ऐसे कि पत्थर मारने से फल देते हैं" का क्या अर्थ है?
2. "वैराग्य और भक्ति का उदय होता था" इस कथन से लेखक का कौन-सा भाव प्रकट होता है?
3. "पत्थर पर का भोजन का सुख सोने की थाल से बढ़कर था" इस वाक्य का सर्वाधिक उपयुक्त निष्कर्ष क्या है?
4. "एक दिन मैंने श्री गंगा जी के तट पर रसोई करके पत्थर ही पर जल के अत्यंत निकट परोसकर भोजन किया।" यह प्रसंग किस मूल्य को बढ़ावा देता है?
5. लेखक का हरिद्वार अनुभव मुख्यतः किस प्रकार का था?
6. पत्र की भाषा का एक मुख्य लक्षण क्या है?
(ख) मिलकर करें मिलान [पृष्ठ - 50]
| शब्द | उपयुक्त संदर्भ |
|---|---|
| हरिद्वार | भारत के उत्तराखंड राज्य में स्थित प्रसिद्ध तीर्थस्थान जहाँ से गंगा पहाड़ों को छोड़कर मैदान में आती है। |
| गंगा | भारतवर्ष की प्रधान नदी जो हिमालय से निकलकर बंगाल की खाड़ी में गिरती है (भागीरथी, सुरनदी आदि)। |
| भगीरथ | अयोध्या के सूर्यवंशी राजा जो घोर तपस्या करके गंगा को पृथ्वी पर लाए थे। |
| चण्डिका | मान्यताओं के अनुसार देवी दुर्गा का एक रूप (चंडी देवी)। |
| भागवत | अठारह पुराणों में से प्रसिद्ध पुराण जिसमें श्रीकृष्ण संबंधी कथाएँ हैं। |
| दालचीनी | पेड़ की सुगंधित छाल जो दवा और मसाले के काम आती है (दारचीनी)। |
(ग) मिलकर करें चयन (सही निष्कर्ष) [पृष्ठ - 51]
- पर्वतों पर वल्ली हरी-भरी... : ✔ लताओं का फैलना सज्जनों की शुभ इच्छाओं की तरह सौम्यता और सुंदरता को दर्शाता है।
- बड़े-बड़े वृक्ष ऐसे खड़े हैं मानो तपस्या करते हैं... : ✔ वृक्षों की स्थिति साधुओं जैसी है जो हर मौसम को सहते हुए तपस्या करते हैं।
- वृक्षों पर पक्षी निडर होकर कल्लोल करते हैं... : ✔ यहाँ के पक्षी प्रकृति में सुरक्षित अनुभव करते हैं, इसलिए वे निडर होकर कल्लोल करते हैं।
- जल अत्यंत शीतल और मिष्ट है... : ✔ गंगाजल की ठंडक और मिठास का अनुभव बहुत मनोहारी है।
- गंगा तट पर पत्थर पर भोजन किया... : ✔ लेखक ने गंगा के समीप बैठकर भोजन किया, जिससे उनकी प्रकृति से निकटता झलकती है।
- पत्र को स्थानदान दीजिएगा... : ✔ लेखक चाहता है कि पत्र को महत्व देकर पत्रिका में प्रकाशित किया जाए।
(घ) सोच-विचार के लिए [पृष्ठ - 52]
(क) "मैं चित्त से तो अब तक वहीं निवास करता हूँ..." यह क्या दर्शाता है?
उत्तर: यह वाक्य दर्शाता है कि हरिद्वार के पावन, शांत और दिव्य वातावरण ने लेखक के मन पर ऐसी गहरी छाप छोड़ी कि वे शारीरिक रूप से लौट आने के बाद भी मानसिक रूप से उसी शांति और आनंद में डूबे हुए हैं।
(ख) "पंडे भी यहाँ बड़े विलक्षण संतोषी हैं..." यह कथन आज कितना सच है?
उत्तर: 1871 ई. में पंडे यजमान द्वारा स्वेच्छा से दिए गए एक पैसे से भी प्रसन्न हो जाते थे। आज व्यावसायिकता बढ़ जाने से ऐसा संतोष कम दिखाई देता है, फिर भी कुछ पारंपरिक व ज्ञानी तीर्थ-पुरोहित आज भी संतोषी स्वभाव के हैं।
(ग) दीवान कृपा राम के बंगले को लेखक ने 'टिकने योग्य' क्यों कहा?
उत्तर: वह स्थान ऊँचाई पर था जहाँ से चारों ओर से शीतल, शुद्ध हवा आती थी तथा वहाँ से गंगा, पर्वतों और प्राकृतिक दृश्यों का मनोहारी दर्शन होता था।
(घ) वृक्षों के महत्व के बारे में कौन-सी बातें सूझती हैं?
उत्तर: वृक्ष जीवनदाता और निस्वार्थ परोपकारी हैं। वे फल, फूल, लकड़ी, छाया, औषधि देने के साथ-साथ जलने के बाद राख व कोयले से भी मनुष्य की सेवा करते हैं और बदले में कुछ नहीं मांगते।
(ङ) व्याकरण : आदरार्थ बहुवचन एवं भाव-पहचान [पृष्ठ - 53-54]
(१) 'है' और 'हैं' से रिक्त स्थानों की सही पूर्ति:
- प्रधानाचार्य जी विद्यालय में नहीं हैं। वे अभी सभा में उपस्थित हैं।
- माता-पिता हमारे जीवन के मार्गदर्शक होते हैं। हमें उनका कहना मानना चाहिए।
- मेरी बहन बाजार जा रही है। वहाँ से किताबें ले आएगी।
- बाहर फेरीवाला है। क्या मैं फल ले आऊँ?
- डाकिया जी आए हैं। उन्हें भी बुला लाओ।
- आप तो बहुत दिन बाद आए हैं।
- डॉक्टर साहब बहुत विद्वान हैं।
- आपके माता-पिता कहाँ हैं?
- ये हमारे हिंदी के अध्यापक हैं। हम इनसे बहुत-कुछ सीखते-समझते हैं।
- बंदर पेड़ पर उछल-कूद कर रहे हैं।
(२) पंक्तियों में निहित भाव पहचानिए [पृष्ठ - 54]:
- "उस समय के पत्थर पर का भोजन का सुख सोने की थाल से बढ़ के था" ➔ संतोष / सादगी
- "चित्त में बारंबार ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का उदय होता था" ➔ भक्ति / वैराग्य / शांति
- "पंडे भी यहाँ बड़े विलक्षण संतोषी हैं" ➔ संतोष / आश्चर्य
- "हर तरफ पवित्रता और प्रसन्नता बिखरी हुई थी" ➔ शांति / आनंद
- "सज्जन ऐसे कि पत्थर मारने से फल देते हैं" ➔ परोपकार / दया
(च) काल की पहचान एवं काल-परिवर्तन [पृष्ठ - 55]
| मूल वाक्य | मूल काल | काल-परिवर्तन (उदाहरण) |
|---|---|---|
| 1. आप इस पत्र को स्थानदान दीजिएगा। | भविष्य काल | आपने पत्र को स्थानदान दिया। (भूतकाल) |
| 2. यह भूमि तीन ओर पर्वतों से घिरी है। | वर्तमान काल | यह भूमि पर्वतों से घिरी थी। (भूतकाल) |
| 3. वृक्ष ऐसे हैं कि पत्थर मारने से फल देते हैं। | वर्तमान काल | वृक्ष पत्थर मारने पर फल देंगे। (भविष्य काल) |
| 4. ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का उदय होता था। | भूतकाल | ज्ञान और भक्ति का उदय होता है। (वर्तमान काल) |
| 5. मैं कृपा राम के बंगले पर टिका था। | भूतकाल | मैं कृपा राम के बंगले पर टिकूँगा। (भविष्य काल) |
(छ) भाषा-रूपांतरण एवं पाठ्य-पहेली हल [पृष्ठ - 57-61]
(१) 150 वर्ष पुरानी पंक्तियों का आधुनिक हिन्दी रूप [पृष्ठ - 57-58]:
- प्राचीन: "मानो हरे गलीचा की जात्रियों के विश्राम के हेतु बिछायत बिछी थी।" ➔ आधुनिक रूप: मानो यात्रियों के विश्राम के लिए हरा कालीन बिछा हुआ था।
- प्राचीन: "इच्छा क्रोध की खानि जो मनुष्य हैं सो वहाँ रहते ही नहीं।" ➔ आधुनिक रूप: जो मनुष्य काम-क्रोध से भरे हैं, वे यहाँ नहीं रहते।
- प्राचीन: "शिषर पर चण्डिका देवी की मूर्ति है।" ➔ आधुनिक रूप: शिखर पर चंडी देवी की प्रतिमा है।
१. कठिन शब्दार्थ तालिका
| क्र.सं. | कठिन शब्द | अर्थ | वाक्य प्रयोग |
|---|---|---|---|
| 1 | वल्ली | लता / बेल | पर्वतों पर हरी-भरी वल्ली फैली हुई है। |
| 2 | मनोरथ | मन की इच्छा / संकल्प | सज्जन सदैव दूसरों के शुभ मनोरथ पूरे करते हैं। |
| 3 | अर्थी | याचक / चाहने वाला / जरूरतमंद | वृक्षों के द्वार से कोई अर्थी खाली हाथ नहीं लौटता। |
| 4 | बधिक | शिकारी / वध करने वाला | जंगल में पक्षी दुष्ट बधिक से डरकर उड़ गए। |
| 5 | कल्लोल | क्रीड़ा / आनंद-विहार / चहचहाना | गंगा की धारा में जल-जंतु कल्लोल कर रहे थे। |
| 6 | स्थानदान | पत्रिका में प्रकाशित करने हेतु जगह देना | संपादक महोदय ने रचना को स्थानदान दिया। |
२. विलोम एवं पर्यायवाची शब्द सारणी
| शब्द | विलोम शब्द | पर्यायवाची शब्द |
|---|---|---|
| शीतल | उष्ण, गर्म, तप्त | ठंडा, सुखद, शांत |
| निर्मल | मलिन, दूषित | स्वच्छ, पावन, पवित्र, शुद्ध |
| संतोषी | लोभी, असंतुष्ट | तृप्त, सबुरी, शांतचित्त |
| पर्वत | मैदान, घाटी | पहाड़, गिरि, शैल, अचल, नग |
३. संधि, समास, उपसर्ग एवं प्रत्यय सारणी
| घटक का प्रकार | शब्द / पद | विच्छेद / विग्रह / विश्लेषण |
|---|---|---|
| संधि | मनोरथ पारायण | मनः + रथ (विसर्ग संधि) पार + अयन (दीर्घ स्वर संधि) |
| समास | त्रिभुवन नीलधारा फल-फूल | तीन भुवनों का समूह (द्विगु समास) नीली है जो धारा (कर्मधारय समास) फल और फूल (द्वंद्व समास) |
| उपसर्ग | विमुख अपूर्व | वि (उपसर्ग) + मुख अ (उपसर्ग) + पूर्व |
| प्रत्यय | धार्मिकता सुगंधित | धार्मिक + ता (प्रत्यय) सुगंध + इत (प्रत्यय) |
४. पाठ में प्रयुक्त मुहावरे
| मुहावरा | अर्थ | वाक्य प्रयोग |
|---|---|---|
| एक पैर पर खड़े होना | कठिन तपस्या अथवा सेवा में तत्पर रहना | पर्वत के विशाल वृक्ष एक पैर पर खड़े होकर साधु-तपस्या करते प्रतीत होते हैं। |
| खाली हाथ न लौटना | मनोरथ पूरा होना / विमुख न होना | परोपकारी व्यक्ति के द्वार से कोई याचक खाली हाथ नहीं लौटता। |
| एक पैसे को लाख मानना | अत्यधिक संतोषी होना | हरिद्वार के संतोषी पुरोहित एक पैसे को भी लाख मानकर यजमान को शुभाशीष देते हैं। |

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