संस्कृत में वाच्य परिवर्तन के नियम
वाच्य का अर्थ होता है वाक्य के कथन का प्रकार। एक ही वाक्य को कई प्रकार से बोला या लिखा जा सकता है।जैसे.. 1..रामः पुस्तकं पठति। राम पुस्तक पढ़ता है। रामेण पुस्तकं पठ्यते.. राम के द्वारा पुस्तक पढ़ा जाता है। दोनों वाक्यों का भाव समान है, परन्तु अलग -अलग ढंग से कहा गया है। वाक्य संख्या 1 कर्तृ वाच्य में है , तथा वाक्य संख्या 2 कर्म वाच्य में है।
वाच्य परिवर्तन क्या है..
व्याकरण में….एक प्रकार के वाच्य को दूसरे प्रकार में परिवर्तित करना , वाच्य-परिवर्तन कहा जाता है। संस्कृत में वाच्य परिवर्तन के कुछ नियम हैं जो इस प्रकार हैं…
1. कर्तृवाच्य
इस वाच्य में कर्ता प्रधान होता है तथा क्रिया कर्ता के अनसार प्रयुक्त होती है।
इसके कर्ता में प्रथमा विभक्ति तथा कर्म में द्वितीया विभक्ति का प्रयोग होता है।
यथा— राम: गृहं गच्छति।
इस वाक्य में ‘राम’ कर्ता और ‘गृहम्’ कर्म है। इसकी क्रिया 'गच्छति' कर्ता 'राम' के अनसार एकवचन की है। बालिका पाठम पठितवती। इस वाक्य में 'बालिका' कर्ता तथा 'पाठम' कर्म तथा ‘पठितवती’ क्रिया है। सैनिक: देशं रक्षति। इस वाक्य में 'सैनिक:' कर्ता, 'देशम' कर्म तथा 'रक्षति' क्रिया है।
इसके कर्ता में प्रथमा विभक्ति तथा कर्म में द्वितीया विभक्ति का प्रयोग होता है।
यथा— राम: गृहं गच्छति।
इस वाक्य में ‘राम’ कर्ता और ‘गृहम्’ कर्म है। इसकी क्रिया 'गच्छति' कर्ता 'राम' के अनसार एकवचन की है। बालिका पाठम पठितवती। इस वाक्य में 'बालिका' कर्ता तथा 'पाठम' कर्म तथा ‘पठितवती’ क्रिया है। सैनिक: देशं रक्षति। इस वाक्य में 'सैनिक:' कर्ता, 'देशम' कर्म तथा 'रक्षति' क्रिया है।
2. कर्मवाच्य
कर्मवाच्य में कर्म की प्रधानता होती है, अत: कर्म में प्रथमा तथा कर्ता में तृतीृया
विभक्ति का प्रयोग होता है।
यहाँ क्रिया का प्रयोग कर्म के अनसार होता है। जिस
लिङ्ग, पुरुष तथा वचन में कर्म होता है, उसी लिङ्ग, पुरुष तथा वचन में क्रिया
का प्रयोग होता है।
यथा— रामेण गृहं गम्यते। विद्यार्थिना पाठ: पठ्यते।
मया चित्रे दृश्येते।
इन वाक्यों में क्रमश: गृहम् , पाठ: तथा चित्रे कर्म हैं। अत: प्रथम दो वाक्यों
में कर्म के एकवचन के अनसार क्रिया भी एकवचन में तथा तीसरे में चित्रे में
द्विवचन के कारण क्रिया भी द्विवचन में प्रयुक्त है।
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3. भाववाच्य
भाववाच्य के कर्ता में तृतीया विभक्ति का प्रयोग होता है। भाववाच्य में क्रिया
का अर्थ या भाव ही प्रधान होता है, क्रिया प्रथम परुष एकवचन में ही प्रयुक्त
होती है। भले ही कर्ता एकवचन में हो या बहुवचन में।
यथा— (मया / त्वया / यवुाभ्याम / आवाभ्यां / अस्माभि: / तै:) सुप्यते/आस्यते।
वाच्य परिवर्तन के नियम—
कर्तृवाच्य में वर्तमानकाल की क्रियाओं को यदि कर्मवाच्य में परिवर्तित किया जाता है तो क्रियाओ में इस प्रकार परिवर्तन
होता है।
उदाहरण—
कर्तृवाच्य की क्रिया — कर्मवाच्य / भाववाच्य की क्रिया
पठति — पठ्यते
लिखति — लिख्यते
खादति — खाद्यते
भवति — भयूते
धावति — धाव्यते
हसति — हस्यते
करोति — क्रियते
क्रीणाति — क्रीयते
नयति — नीयते
गच्छति — गम्यते
उत्पतति — उत्पत्यते
रोदिति — रुद्यते



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