वृक्षाः सत्पुरुषाः इव
(वृक्ष सज्जन पुरुषों के समान होते हैं - पर्यावरणसंरक्षणं परोपकारश्च)
1. पाठ परिचय (Introduction) [पृष्ठ - १६०]
पर्यावरणसंरक्षणस्य विषये एका प्रदर्शनी विद्यालये आयोजिता अस्ति छात्राः तां प्रदर्शनीं पश्यन्ति शिक्षकेण सह संलापं च कुर्वन्ति। अस्मिन् पाठे वृक्षाणां परोपकारी स्वभावः तथा तेषां सत्पुरुषैः सह तुलना सुभाषितैः दर्शिता अस्ति।
(पर्यावरण संरक्षण के विषय में विद्यालय में एक प्रदर्शनी आयोजित की गई है। छात्र प्रदर्शनी देखते हैं और शिक्षक से बातचीत करते हैं। इस पाठ में वृक्षों के परोपकारी स्वभाव और सज्जनों से उनकी तुलना को सुंदर नीति-श्लोकों द्वारा समझाया गया है ।)
2. प्रदर्शनी-संवादः (Exhibition Dialogue) [पृष्ठ - १६०]
🌿 पाठगतानि सुभाषितानि सभावार्थम् (Subhashitas & Meanings) [पृष्ठ - १६१-१६३]
छायामन्यस्य कुर्वन्ति तिष्ठन्ति स्वयमातपे ।
फलान्यपि परार्थाय वृक्षाः सत्पुरुषा इव ॥१॥
हिंदी भावार्थ: वृक्ष स्वयं धूप (आतप) में खड़े रहते हैं परंतु दूसरों को छाया प्रदान करते हैं। उनके फल भी दूसरों के उपकार के लिए ही होते हैं, अतः वृक्ष सज्जनों के समान हैं।
दशकूपसमा वापी दशवापीसमो हृदः ।
दशहृदसमः पुत्रः दशपुत्रसमो द्रुमः ॥२॥
हिंदी भावार्थ: दस कुओं के समान एक बामणी (बावड़ी) होती है, दस बावड़ियों के समान एक तालाब होता है, दस तालाबों के समान एक संतान होती है और दस संतानों के समान एक वृक्ष उपकारी होता है।
परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः परोपकाराय वहन्ति नद्यः ।
परोपकाराय दुहन्ति गावः परोपकारार्थमिदं शरीरम् ॥३॥
हिंदी भावार्थ: वृक्ष परोपकार के लिए फल देते हैं, नदियाँ परोपकार के लिए बहती हैं, गाएँ परोपकार के लिए दूध देती हैं, यह शरीर भी परोपकार के लिए ही है।
पिबन्ति नद्यः स्वयमेव नाम्भः स्वयं न खादन्ति फलानि वृक्षाः ।
नादन्ति सस्यं खलु वारिवाहाः परोपकाराय सतां विभूतयः ॥४॥
हिंदी भावार्थ: नदियाँ अपना जल स्वयं नहीं पीतीं, वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाते, बादल उगाई हुई फसल स्वयं नहीं खाते। इसी प्रकार सज्जनों की समृद्धियाँ (संपत्ति) परोपकार के लिए ही होती हैं।
💡 विशेष टिप्पणी (पर्यावरण व नैतिक बोध):
- वृक्षस्य अङ्गानि (वृक्ष के भाग): पुष्प (फूल), पत्र (पत्ता), फल, छाया, मूल (जड़), वल्कल (छाल), दारु/काष्ठ (लकड़ी)। ये सभी मनुष्यों और प्राणियों की सेवा में समर्पित हैं।
- सज्जन-लक्षणम्: जो स्वयं कष्ट सहकर भी दूसरों को सुख पहुँचाता है, वही सत्पुरुष है। वृक्ष इसका सबसे उत्तम उदाहरण हैं।
3. क्रमवार अभ्यास कार्य (Exercises) [पृष्ठ - १६४-१६७]
अभ्यास २: एकपदेन उत्तरत (एक शब्द में उत्तर दें) [पृष्ठ - १६४, १६५]
- (क) वृक्षाः स्वयं कुत्र तिष्ठन्ति ?
उत्तरम्: आतपे (धूप में) - (ख) परोपकाराय काः वहन्ति ?
उत्तरम्: नद्यः - (ग) दशवापीसमः कः भवति ?
उत्तरम्: हृदः (तालाब) - (घ) सत्पुरुषाः इव के सन्ति ?
उत्तरम्: वृक्षाः - (ङ) वृक्षाः स्वयं कानि न खादन्ति ?
उत्तरम्: फलानि
अभ्यास ७: कः किं ददाति इति मेलनम् (कौन क्या देता है) [पृष्ठ - १६६]
| दाता | देय-वस्तु (उत्तरम्) |
|---|---|
| (क) वृक्षः | शुद्धं वायुं ददाति |
| (ख) गौः | दुग्धं ददाति |
| (ग) सूर्यः | प्रकाशं ददाति |
| (घ) नदी | जलं ददाति |
| (ङ) अग्निः | तापं ददाति |
| (च) शिक्षकः | ज्ञानं ददाति |
4. व्याकरणिक घटकाः (Grammar Tables)
(i) क्रियापद सारणी (Verbs Table)
| क्र.सं. | क्रियापद | मूल धातु | लकार-पुरुष-वचन | हिंदी अर्थ |
|---|---|---|---|---|
| १ | तिष्ठन्ति | स्था (तिष्ठ्) | लट्, प्रथम, बहुवचन | रहते/बैठते हैं |
| २ | फलन्ति | फल् | लट्, प्रथम, बहुवचन | फलते हैं |
| ३ | वहन्ति | वह् | लट्, प्रथम, बहुवचन | बहती हैं |
| ४ | पिबन्ति | पा (पिब्) | लट्, प्रथम, बहुवचन | पीते हैं |
(ii) कठिन शब्दार्थ सारणी (Vocabulary Table) [पृष्ठ - १६४]
| क्र.सं. | कठिन शब्द | संस्कृत व्याख्या | हिंदी अर्थ | अंग्रेजी अर्थ |
|---|---|---|---|---|
| १ | आतपे | सूर्यतापे | धूप में | In the sunlight |
| २ | परार्थाय | अन्येषाम् उपकाराय | दूसरों के उपकार हेतु | For sake of others |
| ३ | महीरुहाः | वृक्षाः | पेड़ / वृक्ष | Trees |
| ४ | वारिवाहाः | मेघाः | बादल | Clouds |
(iii) अव्यय, उपसर्ग एवं प्रत्यय सारणी
| प्रकार | पद (Word) | संरचना/विवरण | अर्थ |
|---|---|---|---|
| अव्यय पद | इव, स्वयम्, न, अपि, खलु | अविकारी शब्द | समान/तरह, स्वयं, नहीं, भी, निश्चित रूप से |
| उपसर्ग पद | परोपकारः, प्रविशन्ति | पर + उपकारः, प्र + विश् | दूसरों का भला, प्रवेश करते हैं |
(iv) पाठगत सन्धि सारणी (Sandhi Table)
| क्र.सं. | सन्धि पद | विच्छेद (Breakup) | सन्धि का नाम |
|---|---|---|---|
| १ | स्वयामातपे | स्वयम् + आतपे | व्यंजन संयोग |
| २ | फलान्यपि | फलानि + अपि | यण् स्वर सन्धि |
| ३ | सत्पुरुषा इव | सत्पुरुषाः + इव | विसर्ग लोप सन्धि |
| ४ | नाम्भः | न + अम्भः | दीर्घ स्वर सन्धि |

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