वाच्य-प्रकरणम् (वाच्य-परिवर्तनम्)
(कर्तरि, कर्मणि, भावे च प्रयोगः — तिङन्त-कृदन्तरूपैः सह नियम-सारणी)
१. वाच्य-स्वरूपं तस्य भेदाः च [पृष्ठ - १७७]
२. कर्तृ-कर्मवाच्ययोः नियमाः रूपान्तरणं च [पृष्ठ - १७७-१८०]
कर्मवाच्य-निर्माण-प्रक्रिया (यक्-प्रत्यय-विधानम्):
- यक्-संयोजनम्: धातु के बाद 'य' जुड़ता है तथा आत्मनेपद के प्रत्यय (ते, इते, न्ते आदि) लगते हैं। यथा — पठ् + य + ते = पठ्यते; गम् + य + ते = गम्यते।
- स्वर-परिवर्तनम्: पा → पीयते, दा → दीयते, नी → नीयते, कृ → क्रियते, श्रु → श्रूयते, ज्ञा → ज्ञायते, दृश् → दृश्यते।
- वचन-व्यवस्था: कर्म के एकवचन होने पर क्रिया एकवचन में, द्विवचन होने पर द्विवचन में तथा बहुवचन होने पर बहुवचन में होती है (यथा— फलानि खाद्यन्ते, श्लोकाः लिख्यन्ते)।
३. भाववाच्य-नियमः (अकर्मकधातु-प्रयोगः) [पृष्ठ - १८१-१८३]
भाववाच्य-लक्षणम्: "भावप्रधानः प्रयोगः भावे प्रयोगः।" केवल अकर्मक धातुओं (हस्, क्रीड्, पत्, स्था, जागृ, शी आदि) से ही भाववाच्य बनता है। इसमें कर्म नहीं होता।
यथा: ते हसन्ति → तैः हस्यते | बालिकाः प्रयतन्ते → बालिकाभिः प्रयत्यते | शिशुः शेते → शिशुना शय्यते।
💡 विशेष टिप्पणी: भूतकाले विधिलिङि च कृदन्तरूपैः वाच्यव्यवस्था [पृष्ठ - १८०-१८३]
१. भूतकाले (क्त / क्तवतु):
• कर्तरि प्रयोगे: 'क्तवतु' प्रत्यय (यथा— बालकः श्लोकं पठितवान्, बालिकाः गतवत्यः)।
• कर्मणि प्रयोगे: 'क्त' प्रत्यय कर्म के लिंग व वचनानुसार (यथा— बालकेन श्लोकः पठितः, राधया पूजा कृता)।
• भावे प्रयोगे: 'क्त' प्रत्यय नित्य नपुंसकलिंग एकवचन में (यथा— तैः हसितम्, शिशुना शयितम्)।
२. प्रेरणार्थे / विधिलिङि (तव्यत् / अनीयर्):
• कर्मणि: कर्मानुसार (यथा— छात्रैः स्वाध्यायः कर्तव्यः / करणीयः)।
• भावे: नित्य नपुंसकलिंग एकवचन में (यथा— नर्तकैः नर्तितव्यम् / नर्तनीयम्, शुनकेन धावितव्यम्)।
४. वाच्य-परिवर्तनस्य प्रमुख-रूपाणि उदाहरणानि च [पृष्ठ - १७९-१८३]
(क) लट्-लकारे (वर्तमानकाले) कर्तृ-कर्म-परिवर्तनम् [पृष्ठ - १८०]
(ख) भूतकाले क्तवतु (कर्तरि) → क्त (कर्मणि) परिवर्तनम् [पृष्ठ - १८०-१८१]
(ग) अकर्मक-धातूनां भाववाच्य-रूपाणि [पृष्ठ - १८२-१८३]
५. व्याकरणिक-घटकाः (सारण्यः)
(क) कठिन-शब्दार्थ-सारणी [पृष्ठ - १७७-१८३]
| क्र.सं. | कठिन शब्द | संस्कृत व्याख्या | हिन्दी अर्थ | English Meaning |
|---|---|---|---|---|
| १ | वाच्यम् | वचनस्य / कथनस्य प्रकारः | कहने की विधि (वाच्य / Voice) | Voice in Grammar |
| २ | अकर्मकधातुः | कर्मरहितः धातुः | जिस धातु में कर्म न हो | Intransitive Verb |
| ३ | सकर्मकधातुः | कर्मसहितः धातुः | जिस धातु में कर्म की अपेक्षा हो | Transitive Verb |
| ४ | यक्-प्रत्ययः | कर्मणि-भावे च विधीयमानः प्रत्ययः | कर्म और भाव में लगने वाला 'य' | Passive marker suffix 'yak' |
(ख) पाठगत क्रियापद-सारणी (कर्तरि-कर्मणि रूपाणि) [पृष्ठ - १७९]
| क्र.सं. | कर्तरि रूपम् | कर्मणि/भावे रूपम् | मूल धातु | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|---|---|
| १ | पठति | पठ्यते | पठ् (व्यक्तायां वाचि) | पढ़ता है / पढ़ा जाता है |
| २ | पिबति | पीयते | पा (पाने) | पीता है / पिया जाता है |
| ३ | करोति | क्रियते | कृ (करणे) | करता है / किया जाता है |
| ४ | पश्यति | दृश्यते | दृश् (प्रेक्षणे) | देखता है / देखा जाता है |
| ५ | शृणोति | श्रूयते | श्रु (श्रवणे) | सुनता है / सुना जाता है |
(ग) अव्यय-उपसर्ग-प्रत्यय-सारणी
| घटक-प्रकारः | पदम् | संरचना / विवरणम् | अर्थः |
|---|---|---|---|
| कृदन्तः (कर्तरि) | पठितवान् / लिखितवती | पठ् / लिख् + क्तवतु | पढ़ा / लिखी (भूतकालः) |
| कृदन्तः (कर्मणि) | पठितः / खादितानि | पठ् / खाद् + क्त | पढ़ा गया / खाए गए |
| कृदन्तः (योग्यतार्थे) | गन्तव्यः / करणीयः | गम् + तव्यत् / कृ + अनीयर् | जाना चाहिए / करना चाहिए |
| उपसर्गयुक्तपदम् | उपविशति / उत्तिष्ठति | उप + विश् / उद् + स्था | बैठता है / उठता है |
(घ) पाणिनीय / पाठगत सन्धि-सारणी
| क्र.सं. | सन्धि-पदम् | विच्छेदः | सन्धि-नाम (नियमः) |
|---|---|---|---|
| १ | इत्यपि | इति + अपि | यण् स्वरसन्धिः (इको यणचि) |
| २ | कोऽपि | कः + अपि | उत्व-विसर्गसन्धिः / पूर्वरूपम् |
| ३ | पूर्वोत्ताः | पूर्व + उक्ताः | गुण स्वरसन्धिः (आद्गुणः) |
| ४ | इक्षुरसः | इक्षु + रसः | विसर्गलोपः / व्यञ्जनसन्धिः |

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