कक्षा-9 | परिशिष्टम्-५ [पृष्ठ - १९९]
धातुरूपाणि (क्रियापद-प्रकरणम्)
(परस्मैपदि-आत्मनेपदि-णिजन्त-विशिष्टधातूनां पञ्चसु लकारेषु रूपाणि)
१. धातुरूप-परिचयः णिजन्तरूपाणि च (प्रेरणार्थे) [पृष्ठ - १९९]
तिङन्तरूप-व्यवस्था (Verbal Conjugations):
"क्रियायाः वाचकः धातुः। धातूनां रूपसाधनाय परस्मैपदिनः आत्मनेपदिनश्च प्रत्ययाः विधीयन्ते। यदा कर्ता स्वयं कार्यं न कृत्वा अन्यं प्रेरयति, तदा 'णिच्' (इ) प्रत्ययः भवति।"
हिन्दी सरलार्थ: क्रिया के मूल रूप को धातु कहते हैं। धातु दो प्रकार की होती हैं — परस्मैपदी और आत्मनेपदी। जब कर्ता किसी कार्य को स्वयं न करके दूसरों से करवाता है (प्रेरणार्थक क्रिया), तब धातु में णिच्-प्रत्यय लगता है[cite: 9] (यथा— पठति = पढ़ता है → पाठयति = पढ़ाता है[cite: 9])।
'पठ्' धातोः सामान्यरूपं तथा णिजन्त-प्रेरणार्थकरूपम् (लट्-लकारे) [पृष्ठ - १९९]
| पुरुषः |
पठ्-धातुः (सामान्यः) |
पठ् + णिच् (पाठि) प्रेरणार्थे |
हिन्दी अर्थः |
| प्रथमपुरुषः |
पठति / पठतः / पठन्ति |
पाठयति / पाठयतः / पाठयन्ति |
पढ़ाता है / पढ़ाते हैं |
| मध्यमपुरुषः |
पठसि / पठथः / पठथ |
पाठयसि / पाठयथः / पाठयथ |
तुम पढ़ाते हो |
| उत्तमपुरुषः |
पठामि / पठावः / पठामः |
पाठयामि / पाठयावः / पाठयामः |
मैं पढ़ाता हूँ / हम पढ़ाते हैं |
एवमेव अन्ये णिजन्ताः: लिख् → लेखयति, खाद् → खादयति, हस् → हासयति, चल् → चालयति, गम् → गमयति, भुज् → भोजयति, दा → दापयति, श्रु → श्रावयति, ज्ञा → ज्ञापयति[cite: 9]।
२. परस्मैपदि-धातूनां पञ्चसु लकारेषु रूपाणि ('पठ्' धातुः) [पृष्ठ - १९९-२००]
(१) 'पठ्' धातुः — लट्-लकारः (वर्तमानकालः) [पृष्ठ - १९९]
| पुरुषः |
एकवचनम् |
द्विवचनम् |
बहुवचनम् |
| प्रथमपुरुषः | पठति | पठतः | पठन्ति |
| मध्यमपुरुषः | पठसि | पठथः | पठथ |
| उत्तमपुरुषः | पठामि | पठावः | पठामः |
(२) 'पठ्' धातुः — लृट्-लकारः (भविष्यत्कालः) [पृष्ठ - २००]
| पुरुषः |
एकवचनम् |
द्विवचनम् |
बहुवचनम् |
| प्रथमपुरुषः | पठिष्यति | पठिष्यतः | पठिष्यन्ति |
| मध्यमपुरुषः | पठिष्यसि | पठिष्यथः | पठिष्यथ |
| उत्तमपुरुषः | पठिष्यामि | पठिष्यावः | पठिष्यामः |
(३) 'पठ्' धातुः — लङ्-लकारः (भूतकालः) [पृष्ठ - २००]
| पुरुषः |
एकवचनम् |
द्विवचनम् |
बहुवचनम् |
| प्रथमपुरुषः | अपठत् | अपठताम् | अपठन् |
| मध्यमपुरुषः | अपठः | अपठतम् | अपठत |
| उत्तमपुरुषः | अपठम् | अपठाव | अपठाम |
(४) 'पठ्' धातुः — लोट्-लकारः (आज्ञार्थकः) [पृष्ठ - २००]
| पुरुषः |
एकवचनम् |
द्विवचनम् |
बहुवचनम् |
| प्रथमपुरुषः | पठतु / पठतात् | पठताम् | पठन्तु |
| मध्यमपुरुषः | पठ / पठतात् | पठतम् | पठत |
| उत्तमपुरुषः | पठानि | पठाव | पठाम |
(५) 'पठ्' धातुः — विधिलिङ्-लकारः (चाहिए अर्थे) [पृष्ठ - २००]
| पुरुषः |
एकवचनम् |
द्विवचनम् |
बहुवचनम् |
| प्रथमपुरुषः | पठेत् | पठेताम् | पठेयुः |
| मध्यमपुरुषः | पठेः | पठेतम् | पठेत |
| उत्तमपुरुषः | पठेयम् | पठेव | पठेम |
३. आत्मनेपदि-धातूनां पञ्चसु लकारेषु रूपाणि ('वृध्' एवं 'लभ्' धातुः) [पृष्ठ - २०१-२०३]
आत्मनेपद वाक्य-प्रयोग उदाहरणम् (वृध् धातुः - लट्-लकारे) [पृष्ठ - २०१]:
• प्रथमपुरुषः: वृक्षः वर्धते। / वृक्षौ वर्धेते। / वृक्षाः वर्धन्ते।[cite: 9]
• मध्यमपुरुषः: त्वं वर्धसे। / युवां वर्धेथे। / यूयं वर्धध्वे।[cite: 9]
• उत्तमपुरुषः: अहं वर्धे। / आवां वर्धावहे। / वयं वर्धामहे।[cite: 9]
(१) लट्-लकारः (वर्तमानकालः) — 'वृध्' एवं 'लभ्' धातुः [पृष्ठ - २०१]
| पुरुषः |
'वृध्' (एक / द्वि / बहु) |
'लभ्' (एक / द्वि / बहु) |
| प्रथमपुरुषः |
वर्धते / वर्धेते / वर्धन्ते |
लभते / लभेते / लभन्ते |
| मध्यमपुरुषः |
वर्धसे / वर्धेथे / वर्धध्वे |
लभसे / लभेथे / लभध्वे |
| उत्तमपुरुषः |
वर्धे / वर्धावहे / वर्धामहे |
लभे / लभावहे / लभामहे |
(२) लृट्-लकारः (भविष्यत्कालः) — 'वृध्' एवं 'लभ्' धातुः [पृष्ठ - २०१-२०२]
| पुरुषः |
'वृध्' (एक / द्वि / बहु) |
'लभ्' (एक / द्वि / बहु) |
| प्रथमपुरुषः |
वर्धिष्यते / वर्धिष्येते / वर्धिष्यन्ते |
लप्स्यते / लप्स्येते / लप्स्यन्ते |
| मध्यमपुरुषः |
वर्धिष्यसे / वर्धिष्येथे / वर्धिष्यध्वे |
लप्स्यसे / लप्स्येथे / लप्स्यध्वे |
| उत्तमपुरुषः |
वर्धिष्ये / वर्धिष्यावहे / वर्धिष्यामहे |
लप्स्ये / लप्स्यावहे / लप्स्यामहे |
(३) लङ्-लकारः (भूतकालः) — 'वृध्' एवं 'लभ्' धातुः [पृष्ठ - २०२]
| पुरुषः |
'वृध्' (एक / द्वि / बहु) |
'लभ्' (एक / द्वि / बहु) |
| प्रथमपुरुषः |
अवर्धत / अवर्धेताम् / अवर्धन्त |
अलभत / अलभेताम् / अलभन्त |
| मध्यमपुरुषः |
अवर्धथाः / अवर्धेथाम् / अवर्धध्वम् |
अलभथाः / अलभेथाम् / अलभध्वम् |
| उत्तमपुरुषः |
अवर्धे / अवर्धावहि / अवर्धामहि |
अलभे / अलभावहि / अलभामहि |
(४) लोट्-लकारः (आज्ञार्थकः) — 'वृध्' एवं 'लभ्' धातुः [पृष्ठ - २०३]
| पुरुषः |
'वृध्' (एक / द्वि / बहु) |
'लभ्' (एक / द्वि / बहु) |
| प्रथमपुरुषः |
वर्धताम् / वर्धेताम् / वर्धन्ताम् |
लभताम् / लभेताम् / लभन्ताम् |
| मध्यमपुरुषः |
वर्धस्व / वर्धेथाम् / वर्धध्वम् |
लभस्व / लभेथाम् / लभध्वम् |
| उत्तमपुरुषः |
वर्धै / वर्धावहै / वर्धामहै |
लभै / लभावहै / लभामहै |
(५) विधिलिङ्-लकारः (चाहिए अर्थे) — 'वृध्' एवं 'लभ्' धातुः [पृष्ठ - २०३]
| पुरुषः |
'वृध्' (एक / द्वि / बहु) |
'लभ्' (एक / द्वि / बहु) |
| प्रथमपुरुषः |
वर्धेत / वर्धेयाताम् / वर्धेरन् |
लभेत / लभेयाताम् / लभेरन् |
| मध्यमपुरुषः |
वर्धेथाः / वर्धेयाथाम् / वर्धेध्वम् |
लभेथाः / लभेयाथाम् / लभेध्वम् |
| उत्तमपुरुषः |
वर्धेय / वर्धेवहि / वर्धेमहि |
लभेय / लभेवहि / लभेमहि |
४. विशिष्ट-आत्मनेपदि-धातुरूप-प्रकरणम् ('शीङ्' एवं 'भुज्') [पृष्ठ - २०४-२०६]
(१) 'शीङ्' धातुः (सोना/शयन करना) — पञ्चसु लकारेषु रूपाणि [पृष्ठ - २०४-२०५]
| लकारः |
प्रथमपुरुषः (एक/द्वि/बहु) |
मध्यमपुरुषः (एक/द्वि/बहु) |
उत्तमपुरुषः (एक/द्वि/बहु) |
| लट् (वर्तमान) |
शेते / शयाते / शेरते |
शेषे / शयाथे / शेध्वे |
शये / शेवहे / शेमहे |
| लृट् (भविष्यत्) |
शयिष्यते / शयिष्येते / शयिष्यन्ते |
शयिष्यसे / शयिष्येथे / शयिष्यध्वे |
शयिष्ये / शयिष्यावहे / शयिष्यामहे |
| लङ् (भूत) |
अशेत / अशयाताम् / अशेरत |
अशेथाः / अशयाथाम् / अशेध्वम् |
अशयि / अशेवहि / अशेमहि |
| लोट् (आज्ञार्थक) |
शेताम् / शयाताम् / शेरताम् |
शेष्व / शयाथाम् / शेध्वम् |
शयै / शयावहै / शयामहै |
| विधिलिङ् |
शयीत / शयीयाताम् / शयीरन् |
शयीथाः / शयीयाथाम् / शयीध्वम् |
शयीय / शयीवहि / शयीमहि |
(२) 'भुज्' धातुः (खाना/भोजन करना) — पञ्चसु लकारेषु रूपाणि [पृष्ठ - २०५-२०६]
| लकारः |
प्रथमपुरुषः (एक/द्वि/बहु) |
मध्यमपुरुषः (एक/द्वि/बहु) |
उत्तमपुरुषः (एक/द्वि/बहु) |
| लट् (वर्तमान) |
भुङ्क्ते / भुञ्जाते / भुञ्जते |
भुङ्क्षे / भुञ्जाथे / भुङ्ग्ध्वे |
भुञ्जे / भुञ्ज्वहे / भुञ्ज्महे |
| लृट् (भविष्यत्) |
भोक्ष्यते / भोक्ष्येते / भोक्ष्यन्ते |
भोक्ष्यसे / भोक्ष्येथे / भोक्ष्यध्वे |
भोक्ष्ये / भोक्ष्यावहे / भोक्ष्यामहे |
| लङ् (भूत) |
अभुङ्क्त / अभुञ्जाताम् / अभुञ्जत |
अभुङ्क्थाः / अभुञ्जाथाम् / अभुङ्ग्ध्वम् |
अभुञ्जि / अभुञ्ज्वहि / अभुञ्ज्महि |
| लोट् (आज्ञार्थक) |
भुङ्क्ताम् / भुञ्जाताम् / भुञ्जताम् |
भुङ्क्ष्व / भुञ्जाथाम् / भुङ्ग्ध्वम् |
भुनजै / भुनजावहै / भुनजामहै |
| विधिलिङ् |
भुञ्जीत / भुञ्जीयाताम् / भुञ्जीरन् |
भुञ्जीथाः / भुञ्जीयाथाम् / भुञ्जीध्वम् |
भुञ्जीय / भुञ्जीवहि / भुञ्जीमहि |
💡 विशेष टिप्पणी: आत्मनेपदि-धातूनां स्मरणोपायाः
- समान धातु-रूपाणि: भाषते, वर्तते, कम्पते, स्पर्धते, सेवते, स्पन्दते, यतते, रोचते, मोदते, वन्दते, रमते, शोभते, सहते, शिक्षते आदि सभी धातुओं के रूप 'वृध्' व 'लभ्' के समान ही चलते हैं[cite: 9]।
- लृट् लकार परिवर्तन: 'लभ्' धातु का लृट् में 'लप्स्यते' तथा 'भुज्' का 'भोक्ष्यते' रूप बनता है[cite: 9]।
५. व्याकरणिक-घटकाः (सारण्यः)
(क) कठिन-शब्दार्थ-सारणी
| क्र.सं. |
धातुपदम् |
संस्कृत व्याख्या |
हिन्दी अर्थ |
English Meaning |
| १ |
णिजन्तः |
प्रेरणार्थकः प्रत्ययः |
प्रेरणार्थक क्रिया (करवाना) |
Causative verb form |
| २ |
शेते |
शयनं करोति / सुप्तो भवति |
सोता है |
Sleeps / Lies down |
| ३ |
भुङ्क्ते |
भोजनं करोति / अत्ति |
खाता है / भोजन करता है |
Eats / Consumes |
| ४ |
एधते |
वृद्धिं प्राप्नोति |
बढ़ता है / समृद्ध होता है |
Prospers / Grows |
(ख) पाठगत क्रियापद-सारणी
| क्र.सं. |
क्रियापदम् |
मूल धातु |
लकार-पुरुष-वचन |
हिन्दी अर्थ |
| १ |
पाठयति |
पठ् + णिच् |
लट्. प्र.पु. एकवचनम् |
पढ़ाता है |
| २ |
वर्धिष्यते |
वृध् (आत्मने.) |
लृट्. प्र.पु. एकवचनम् |
बढ़ेगा |
| ३ |
अलभन्त |
लभ् (आत्मने.) |
लङ्. प्र.पु. बहुवचनम् |
प्राप्त किया (सबने) |
| ४ |
शेरताम् |
शीङ् (आत्मने.) |
लोट्. प्र.पु. बहुवचनम् |
सोएँ (वे सब) |
(ग) अव्यय-उपसर्ग-प्रत्यय-सारणी
| घटक-प्रकारः |
पदम् |
संरचना / विवरणम् |
अर्थः |
| प्रत्ययः |
णिच् |
प्रेरणार्थक-प्रत्ययः (इ) |
प्रेरणा अर्थ में |
| अव्ययम् |
एवमेव |
एवम् + एव |
इसी प्रकार ही |
| अव्ययम् |
चेत्यादयः |
च + इति + आदयः |
इत्यादि और भी |
(घ) पाणिनीय / पाठगत सन्धि-सारणी
| क्र.सं. |
सन्धि-पदम् |
विच्छेदः |
सन्धि-नाम (नियमः) |
| १ |
चेत्यादयः |
च + इति + आदयः |
गुण-सन्धिः + यण्-स्वरसन्धिः |
| २ |
एवमेव |
एवम् + एव |
व्यञ्जन-संयोगः |
| ३ |
भोक्ष्यते |
भुज् + स्यते |
गुणः + कुत्वम् + षत्वम् |
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