॥ श्री शिवमहिम्नः स्तोत्रम् ॥
अथ श्री पुष्पदन्त-विरचितं संपूर्णं शिवमहिम्नः स्तोत्रम्
पुष्पदन्त उवाच -
महिम्नः पारं ते परमविदुषो यद्यसदृशी,
स्तुतिर्ब्रह्मादीनामपि तदवसन्नास्त्वयि गिरः।
अथाऽवाच्यः सर्वः स्वमतिपरिणामावधि गृणन्,
ममाप्येष स्तोत्रे हर निरपवादः परिकरः।। १।।
महिम्नः पारं ते परमविदुषो यद्यसदृशी,
स्तुतिर्ब्रह्मादीनामपि तदवसन्नास्त्वयि गिरः।
अथाऽवाच्यः सर्वः स्वमतिपरिणामावधि गृणन्,
ममाप्येष स्तोत्रे हर निरपवादः परिकरः।। १।।
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भावार्थ: हे त्रिकालदर्शी हर! यदि ब्रह्मा जैसे बड़े देवता भी आपकी पूरी महिमा नहीं जान सकते और उनकी वाणी भी कुंठित हो जाती है, तो मुझ जैसे साधारण जन की स्तुति तो कम ही होगी। परंतु यदि अपनी बुद्धि की सीमा के अनुसार स्तवन करने में कोई दोषी नहीं ठहरता, तो हे महादेव! अपनी मति की परिधि में रहकर रचा गया मेरा यह प्रयास भी सर्वथा दोषमुक्त है। आप तो भावग्राही हैं, अतः मेरे इस निष्छल भाव-पुष्प को स्वीकार करें।
अतीतः पन्थानं तव च महिमा वाङमनसयोः,
अतद्व्यावृत्त्या यं चकितमभिधत्ते श्रुतिरपि।
स कस्य स्तोतव्यः कतिविधगुणः कस्य विषयः,
पदे त्वर्वाचीने पतति न मनः कस्य न वचः।। २।।
अतद्व्यावृत्त्या यं चकितमभिधत्ते श्रुतिरपि।
स कस्य स्तोतव्यः कतिविधगुणः कस्य विषयः,
पदे त्वर्वाचीने पतति न मनः कस्य न वचः।। २।।
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भावार्थ: हे नीलकंठ! आपकी महिमा मन और वाणी की पहुँच से सर्वथा परे है। स्वयं वेद भी आपके अनन्त स्वरूप को देखकर स्तब्ध रह जाते हैं और केवल 'नेति-नेति' (यह भी नहीं, वह भी नहीं) कहकर मौन साध लेते हैं। जिसकी सीमा, गुण और स्वरूप का पार कोई न पा सका, उसकी स्तुति भला कौन और कैसे कर सकता है? परंतु जब आप अपने भक्तों के कल्याण हेतु सगुण रूप में अवतरित होते हैं, तब किसका मन और किसकी वाणी आपके उस मंगलकारी रूप में अनुरागी होकर खिल नहीं उठती?
मधुस्फीता वाचः परमममृतं निर्मितवतः,
तव ब्रह्मन् किं वागपि सुरगुरोर्विस्मयपदम्।
मम त्वेतां वाणीं गुणकथनपुण्येन भवतः,
पुनामीत्यर्थेऽस्मिन् पुरमथन बुद्धिर्व्यवसिता।। ३।।
तव ब्रह्मन् किं वागपि सुरगुरोर्विस्मयपदम्।
मम त्वेतां वाणीं गुणकथनपुण्येन भवतः,
पुनामीत्यर्थेऽस्मिन् पुरमथन बुद्धिर्व्यवसिता।। ३।।
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भावार्थ: हे त्रिपुरारि! हे परमब्रह्म! आपने स्वयं अमृत से भी मधुर, रसयुक्त वेदों की सृष्टि की है। अतः संपूर्ण देवों के गुरु बृहस्पति की वाणी भी आपके सम्मुख कोई आश्चर्य उत्पन्न नहीं कर सकती। फिर मेरी यह तुच्छ वाणी आपकी क्या प्रशंसा करेगी? किंतु हे प्रभु! आपके पावन गुणों का गान करने से मेरी स्वयं की वाणी पवित्र और धन्य हो जाएगी—बस इसी भाव-पुण्य की अभिलाषा में मेरी बुद्धि आपके गुणानुवाद में प्रवृत्त हुई है।
तवैश्वर्यं यत्तज्जगदुदयरक्षाप्रलयकृत्,
त्रयीवस्तु व्यस्तं तिस्रुषु गुणभिन्नासु तनुषु।
अभव्यानामस्मिन् वरद रमणीयामरमणीं,
विहन्तुं व्याक्रोशीं विदधत इहैके जडधियः।। ४।।
त्रयीवस्तु व्यस्तं तिस्रुषु गुणभिन्नासु तनुषु।
अभव्यानामस्मिन् वरद रमणीयामरमणीं,
विहन्तुं व्याक्रोशीं विदधत इहैके जडधियः।। ४।।
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भावार्थ: हे वरदायक! जगत् की उत्पत्ति, पालन और संहार करने वाली आपकी त्रिगुणमयी दिव्य शक्ति ही तीन वेदों में ब्रह्मा, विष्णु और महेश के रूप में अभिव्यक्त होती है। आपके इस सर्वमान्य एवं सत्य स्वरूप के उपरांत भी कुछ मतिभ्रमित व दुर्भाग्यशाली जीव व्यर्थ के वितंडवाद और कुतर्कों द्वारा आपके ऐश्वर्य पर प्रश्न उठाते हैं। वे भ्रमित चित्त भले ही स्वयं को बहला लें, किंतु आपकी सनातन सत्ता के सत्य को कभी धूमिल नहीं कर सकते।
किमीहः किंकायः स खलु किमुपायस्त्रिभुवनं,
किमाधारो धाता सृजति किमुपादान इति च।
अतर्क्यैश्वर्ये त्वय्यनवसर दुःस्थो हतधिय,
कुतर्कोऽयं कांश्चित् मुखरयति मोहाय जगतः।। ५।।
किमाधारो धाता सृजति किमुपादान इति च।
अतर्क्यैश्वर्ये त्वय्यनवसर दुःस्थो हतधिय,
कुतर्कोऽयं कांश्चित् मुखरयति मोहाय जगतः।। ५।।
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भावार्थ: हे विश्वेश्वर! मंदबुद्धि लोग प्रायः इस कुतर्क में उलझे रहते हैं कि सृष्टिकर्ता की इच्छा क्या थी, उसका रूप कैसा था, साधन क्या थे और यह जगत् किस आधार पर रचा गया? आपकी अचिन्त्य एवं असीम सामर्थ्य के सम्मुख ऐसे प्रश्न सर्वथा निरर्थक हैं। ये केवल संसारी जीवों के चित्त में मोह और संशय उत्पन्न करने के लिए उपजते हैं, जबकि आपका दिव्य ऐश्वर्य समस्त तर्कों से परे, स्वयंसिद्ध और शाश्वत है।
अजन्मानो लोकाः किमवयववन्तोऽपि जगतां,
अधिष्ठातारं किं भवविधिरनादृत्य भवति।
अनीशो वा कुर्याद् भुवनजनने कः परिकरो,
यतो मन्दास्त्वां प्रत्यमरवर संशेरत इमे।। ६।।
अधिष्ठातारं किं भवविधिरनादृत्य भवति।
अनीशो वा कुर्याद् भुवनजनने कः परिकरो,
यतो मन्दास्त्वां प्रत्यमरवर संशेरत इमे।। ६।।
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भावार्थ: हे देवशिरोमणि! क्या यह प्रत्यक्ष दृश्यमान, अवयवयुक्त संपूर्ण लोक बिना किसी स्रष्टा के स्वयं निर्मित हो सकता है? क्या इस जगत् की रचना व्यवस्थापक और नियंता के बिना संभव है? आपके बिना इस विशाल ब्रह्मांड का विधान कौन चला सकता है? फिर भी जो अज्ञानी आपके जगत्कारण रूप पर संदेह करते हैं, वे वस्तुतः स्वयं के विवेकशून्य होने का ही परिचय देते हैं।
त्रयी सांख्यं योगः पशुपतिमतं वैष्णवमिति,
प्रभिन्ने प्रस्थाने परमिदमदः पथ्यमिति च।
रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिल नानापथजुषां,
नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव।। ७।।
प्रभिन्ने प्रस्थाने परमिदमदः पथ्यमिति च।
रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिल नानापथजुषां,
नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव।। ७।।
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भावार्थ: हे परमपिता! वेदमार्ग, सांख्य, योग, शैवमत अथवा वैष्णवमत—विभिन्न रुचियों और संस्कारों के कारण मनुष्य अपनी-अपनी दृष्टि से सीधे या घुमावदार मार्ग चुनते हैं। वे परस्पर भिन्न प्रतीत हो सकते हैं, किंतु जैसे अंततः समस्त सरिताओं का जल बहकर एक ही महासमुद्र में विलीन हो जाता है, वैसे ही निष्ठापूर्वक चले गए इन समस्त मार्गों का अंतिम प्राप्य और विश्राम केवल और केवल आप ही हैं।
महोक्षः खट्वांगं परशुरजिनं भस्म फणिनः,
कपालं चेतीयत्तव वरद तन्त्रोपकरणम्।
सुरास्तां तामृद्धिं दधति तु भवद्भूप्रणिहितां,
न हि स्वात्मारामं विषय मृगतृष्णा भ्रमयति।। ८।।
कपालं चेतीयत्तव वरद तन्त्रोपकरणम्।
सुरास्तां तामृद्धिं दधति तु भवद्भूप्रणिहितां,
न हि स्वात्मारामं विषय मृगतृष्णा भ्रमयति।। ८।।
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भावार्थ: हे भोलनाथ! आपकी केवल एक भृकुटी के विलास से समस्त देवगण अपार रिद्धि-सिद्धि और ऐश्वर्य भोगते हैं, किंतु आपका स्वयं का परिग्रह क्या है?—एक वृद्ध बैल, खट्वांग, फरसा, मृगछाला, भस्म, नगेन्द्र और हाथ में खप्पर! आपकी यह अकिंचनता सिद्ध करती है कि जो स्वयं अपने आत्मानंद में लीन रहता है, उसे संसार के नश्वर भोग-विलास की मरीचिका कभी विचलित नहीं कर सकती।
ध्रुवं कश्चित् सर्वं सकलमपरस्त्वध्रुवमिदं,
परो ध्रौव्याऽध्रौव्ये जगति गदति व्यस्तविषये।
समस्तेऽप्येतस्मिन् पुरमथन तैर्विस्मित इव,
स्तुवन् जिह्रेमि त्वां न ननु धृष्टा मुखरता।। ९।।
परो ध्रौव्याऽध्रौव्ये जगति गदति व्यस्तविषये।
समस्तेऽप्येतस्मिन् पुरमथन तैर्विस्मित इव,
स्तुवन् जिह्रेमि त्वां न ननु धृष्टा मुखरता।। ९।।
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भावार्थ: हे पुरारि! दार्शनिक इस जगत् को कोई नित्य (शाश्वत) कहता है, कोई अनित्य (क्षणभंगुर), तो कोई इसे नित्यानित्य का सम्मिश्रण मानता है। इन विद्वानों के मतमतांतरों से चकित होकर भी, मैं निःसंकोच आपकी स्तुति में लीन हूँ। यदि मेरा यह प्रयास प्राज्ञों की दृष्टि में धृष्टता या वाचालता भी लगे, तो भी आपकी भक्ति में बहती मेरी वाणी लज्जित नहीं होती, क्योंकि मेरे लिए तो आप ही एकमात्र परम सत्य हैं।
तवैश्वर्यं यत्नाद् यदुपरि विरिंचिर्हरिरधः,
परिच्छेतुं यातावनिलमनलस्कन्धवपुषः।
ततो भक्तिश्रद्धा-भरगुरु-गृणद्भ्यां गिरिश यत्,
स्वयं तस्थे ताभ्यां तव किमनुवृत्तिर्न फलति।। १०।।
परिच्छेतुं यातावनिलमनलस्कन्धवपुषः।
ततो भक्तिश्रद्धा-भरगुरु-गृणद्भ्यां गिरिश यत्,
स्वयं तस्थे ताभ्यां तव किमनुवृत्तिर्न फलति।। १०।।
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भावार्थ: हे गिरिश! जब ब्रह्मा और विष्णु में अपनी-अपनी श्रेष्ठता को लेकर विवाद हुआ, तबआपने अंतहीन अनल-स्तंभ (अग्निस्तंभ) का रूप धारण किया। ब्रह्मा जी ऊपर की ओर और श्रीहरि नीचे की ओर आपकी सीमा मापने निकले, किंतु अंत न पा सके। अंततः जब उन्होंने अहंकार त्यागकर पूर्ण श्रद्धा और शरणागति के साथ आपकी स्तुति की, तब आपने स्वयं प्रकट होकर उन्हें अपना दिव्य दर्शन दिया। सत्य ही है, आपकी अनन्य भक्ति और अनुवृत्ति भला कब निष्फल गई है!
अयत्नादापाद्य त्रिभुवनमवैरव्यतिकरं,
दशास्यो यद्बाहूनभृत-रणकण्डू-परवशान्।
शिरःपद्मश्रेणी-रचितचरणाम्भोरुह-बलेः,
स्थिरायास्त्वद्भक्तेस्त्रिपुरहर विस्फूर्जितमिदम्।। ११।।
दशास्यो यद्बाहूनभृत-रणकण्डू-परवशान्।
शिरःपद्मश्रेणी-रचितचरणाम्भोरुह-बलेः,
स्थिरायास्त्वद्भक्तेस्त्रिपुरहर विस्फूर्जितमिदम्।। ११।।
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भावार्थ: हे त्रिपुरांतक! दशानन रावण ने निसंकोच अपने नौ मस्तक काटकर आपके चरणकमलों में कमल-पुष्पों की भांति अर्पित कर दिए थे। उसकी इस अनन्य और अविचल भक्ति से प्रसन्न होकर आपने उसे जो वरदान दिया, उसी के प्रभाव से उसकी बीसों भुजाएँ त्रिभुवन को निष्कंटक कर समरांगण में अजेय बनी रहीं। उसकी वह प्रचंड शक्ति वस्तुतः आपकी भक्ति की ही पावन परिणति थी।
अमुष्य त्वत्सेवा-समधिगतसारं भुजवनं,
बलात् कैलासेऽपि त्वदधिवसतौ विक्रमयतः।
अलभ्यापातालेऽप्यलसचलितांगुष्ठशिरसि,
प्रतिष्ठा त्वय्यासीद् ध्रुवमुपचितो मुह्यति खलः।।१२।।
बलात् कैलासेऽपि त्वदधिवसतौ विक्रमयतः।
अलभ्यापातालेऽप्यलसचलितांगुष्ठशिरसि,
प्रतिष्ठा त्वय्यासीद् ध्रुवमुपचितो मुह्यति खलः।।१२।।
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भावार्थ: हे शंभो! आपकी कृपा से प्राप्त बल के मद में अंधा होकर रावण आपकी ही पावन क्रीड़ास्थली कैलाश को उखाड़ने चला। जब माता पार्वती भयभीत हुईं, तब आपने केवल अपने चरण के अंगूठे के अग्रभाग से पर्वत को तनिक दबा दिया। इतने मात्र से रावण कैलाश के नीचे दबकर पाताल तक जा धंसा और उसे कहीं आश्रय न मिला। सत्य ही है, जब विवेकहीन जीव को अनायास अत्यधिक बल या ऐश्वर्य मिल जाता है, तो उसका मद उसे स्वयं अपने विनाश की ओर ले जाता है।
यदृद्धिं सुत्राम्णो वरद परमोच्चैरपि सतीं,
अधश्चक्रे बाणः परिजनविधेयत्रिभुवनः।
न तच्चित्रं तस्मिन् वरिवसितरि त्वच्चरणयोः,
न कस्याप्युन्नत्यै भवति शिरसस्त्वय्यवनतिः।। १३।।
अधश्चक्रे बाणः परिजनविधेयत्रिभुवनः।
न तच्चित्रं तस्मिन् वरिवसितरि त्वच्चरणयोः,
न कस्याप्युन्नत्यै भवति शिरसस्त्वय्यवनतिः।। १३।।
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भावार्थ: हे वरदायक! दानवराज बाणासुर ने देवराज इंद्र के वैभव को भी तिरस्कृत कर तीनों लोकों को अपने चरणों में झुका लिया था। किंतु इसमें आश्चर्य कैसा? जो मस्तक आपके पावन चरणों में पूर्ण निष्ठा से झुक जाता है, उसकी उन्नति और अभ्युदय भला ब्रह्मांड में कौन रोक सकता है? आपके सम्मुख नम्र होना ही वस्तुतः परम उत्कर्ष की कुंजी है।
अकाण्ड-ब्रह्माण्ड-क्षयचकित-देवासुरकृपा-
विधेयस्याऽऽसीद् यस्त्रिनयन विषं संहृतवतः।
स कल्माषः कण्ठे तव न कुरुते न श्रियमहो,
विकारोऽपि श्लाघ्यो भुवन-भय-भंग-व्यसनिनः।। १४।।
विधेयस्याऽऽसीद् यस्त्रिनयन विषं संहृतवतः।
स कल्माषः कण्ठे तव न कुरुते न श्रियमहो,
विकारोऽपि श्लाघ्यो भुवन-भय-भंग-व्यसनिनः।। १४।।
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भावार्थ: हे त्रिलोचन! समुद्र मंथन के समय जब संपूर्ण ब्रह्मांड को भस्म कर देने वाला हलाहल विष प्रकट हुआ, तब देवासुरों की रक्षा हेतु आपने करुणावश उसे स्वयं पी लिया। उस कालकूट के कारण आपके कंठ में पड़ा नीला दाग क्या आपकी सुंदरता को कम करता है? कदापि नहीं! वह तो आपकी शोभा को सहस्र गुना बढ़ा देता है। लोक-कल्याण और प्राणिमात्र के भय को हरने के लिए धारण किया गया विकार भी परम वंदनीय और सौंदर्य का आभूषण बन जाता है।
असिद्धार्था नैव क्वचिदपि सदेवासुरनरे,
निवर्तन्ते नित्यं जगति जयिनो यस्य विशिखाः।
स पश्यन्नीश त्वामितरसुरसाधारणमभूत्,
स्मरः स्मर्तव्यात्मा न हि वशिषु पथ्यः परिभवः।। १५।।
निवर्तन्ते नित्यं जगति जयिनो यस्य विशिखाः।
स पश्यन्नीश त्वामितरसुरसाधारणमभूत्,
स्मरः स्मर्तव्यात्मा न हि वशिषु पथ्यः परिभवः।। १५।।
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भावार्थ: हे महादेव! कामदेव के मदन-बाण देवासुर और मनुष्यों में कभी निष्फल नहीं हुए। किंतु जब उसने अपनी सीमा भूलकर आपको भी अन्य साधारण देवताओं के समान तृष्णा-वश समझ लिया, तब आपके तृतीय नेत्र की ज्वाला ने उसे क्षणभर में भस्म कर केवल स्मरणीय (शरीरहीन) बना दिया। जितेंद्रिय योगियों और परम सिद्धों का अनादर करना कभी भी कल्याणकारी नहीं हो सकता।
मही पादाघाताद् व्रजति सहसा संशयपदं,
पदं विष्णोर्भ्राम्यद् भुज-परिघ-रुग्ण-ग्रह-गणम्।
मुहुर्द्यौर्दौस्थ्यं यात्यनिभृत-जटा-ताडित-तटा,
जगद्द्वीपाकारं जलधिवलयं तेन कृतमिति।। १६।।
पदं विष्णोर्भ्राम्यद् भुज-परिघ-रुग्ण-ग्रह-गणम्।
मुहुर्द्यौर्दौस्थ्यं यात्यनिभृत-जटा-ताडित-तटा,
जगद्द्वीपाकारं जलधिवलयं तेन कृतमिति।। १६।।
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भावार्थ: हे नटराज! जब आप जगत् के संरक्षण एवं आनंद हेतु तांडव नृत्य करते हैं, तब आपके चरणों के प्रहार से पृथ्वी डगमगाने लगती है, आपकी विशाल भुजाओं के घूमने से नक्षत्र-मंडल और दिकपाल व्याकुल हो उठते हैं तथा आपकी लहराती जटाओं के आघात से स्वर्गलोक कांप उठता है। आश्चर्य ही है कि जगत् की रक्षा के लिए उठाये गए आपके कदम भी अपनी अतिशय सामर्थ्य के कारण सृष्टि में हलचल मचा देते हैं!
वियद्व्यापी तारा-गण-गुणित-फेनोद्गम-रुचिः,
प्रवाहो वारां यः पृषतलघुदृष्टः शिरसि ते।
जगद्द्वीपाकारं जलधिवलयं तेन कृतमिति,
अनेनैवोन्नेयं धृतमहिम दिव्यं तव वपुः।। १७।।
प्रवाहो वारां यः पृषतलघुदृष्टः शिरसि ते।
जगद्द्वीपाकारं जलधिवलयं तेन कृतमिति,
अनेनैवोन्नेयं धृतमहिम दिव्यं तव वपुः।। १७।।
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भावार्थ: हे गंगेश! आकाश गंगा का वह विशाल, उत्तुंग जलप्रवाह, जो नक्षत्र-तारों से युक्त फेन की भांति अत्यधिक सुरम्य दिखता है, जब आपकी जटाओं में उतरा तो जल की एक नन्ही बूंद समान सिमट कर रह गया। तत्पश्चात् वही जल जब आपकी जटाओं से धरा पर प्रवाहित हुआ तो उसने दिशाओं और महाद्वीपों को आप्लावित कर दिया। इससे ही आपकी अलौकिक, महिमावान और विराट् देह की अनंतता का अनुमान लगाया जा सकता है।
रथः क्षोणी यन्ता शतधृतिरगेन्द्रो धनुरथो,
रथांगे चन्द्रार्कौ रथ-चरण-पाणिः शर इति।
दिधक्षोस्ते कोऽयं त्रिपुरतृणमाडम्बर विधिः,
विधेयैः क्रीडन्त्यो न खलु परतन्त्राः प्रभुधियः।। १८।।
रथांगे चन्द्रार्कौ रथ-चरण-पाणिः शर इति।
दिधक्षोस्ते कोऽयं त्रिपुरतृणमाडम्बर विधिः,
विधेयैः क्रीडन्त्यो न खलु परतन्त्राः प्रभुधियः।। १८।।
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भावार्थ: हे शंभो! त्रिपुरासुर का वध करने के लिए आपने पृथ्वी को रथ, ब्रह्मा को सारथी, मेरु पर्वत को धनुष, सूर्य और चंद्रमा को पहिये तथा श्रीहरि को बाण बनाया। आपके लिए तो तृण समान उन तीन नगरों को भस्म करने हेतु यह सब आडंबर व्यर्थ ही था। वास्तव में, आप किसी साधन के पराधीन नहीं हैं; यह विशाल आयोजन तो केवल आपकी लीला और अपनी प्रजापति शक्तियों के साथ आपका एक दिव्य खेल मात्र था।
हरिस्ते साहस्रं कमल बलिमाधाय पदयोः,
यदेकोने तस्मिन् निजमुदहरन्नेत्रकमलम्।
गतो भक्त्युद्रेकः परिणतिमसौ चक्रवपुषः,
त्रयाणां रक्षायै त्रिपुरहर जागर्ति जगताम्।। १९।।
यदेकोने तस्मिन् निजमुदहरन्नेत्रकमलम्।
गतो भक्त्युद्रेकः परिणतिमसौ चक्रवपुषः,
त्रयाणां रक्षायै त्रिपुरहर जागर्ति जगताम्।। १९।।
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भावार्थ: हे त्रिपुरारि! जब भगवान श्रीहरि सहस्र कमल-पुष्पों से आपकी अर्चना कर रहे थे और एक कमल कम पड़ा, तब उन्होंने बिना किसी संकोच के अपना एक नेत्र-कमल उखाड़कर आपके श्रीचरणों में अर्पित कर दिया। उनके इस अनन्य भक्ति-समर्पण से प्रसन्न होकर आपने ही उन्हें सुदर्शन चक्र प्रदान किया, जिससे वे तीनों लोकों की रक्षा में सदैव तत्पर रहते हैं।
क्रतौ सुप्ते जाग्रत् त्वमसि फलयोगे क्रतुमतां,
क्व कर्म प्रध्वस्तं फलति पुरुषाराधनमृते।
अतस्त्वाम् सम्प्रेक्ष्य क्रतुषु फलदान-प्रतिभुवं,
श्रुतौ श्रद्धां बध्वा दृढपरिकरः कर्मसु जनः।। २०।।
क्व कर्म प्रध्वस्तं फलति पुरुषाराधनमृते।
अतस्त्वाम् सम्प्रेक्ष्य क्रतुषु फलदान-प्रतिभुवं,
श्रुतौ श्रद्धां बध्वा दृढपरिकरः कर्मसु जनः।। २०।।
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भावार्थ: हे फलदाता! यज्ञ की आहुतियाँ पूर्ण होने पर आप ही यजमान को उसके कर्मों का फल प्रदान करते हैं। बिना चेतना और ईश्वरीय अनुग्रह के कोई विनष्ट हुआ कर्म स्वयं फल कैसे दे सकता है? आपको ही वेदों में समस्त कर्मफल का नियामक जानकर, साधकजन दृढ़ श्रद्धा के साथ वैदिक अनुष्ठानों और शुभ कर्मों में प्रवृत्त होते हैं।
क्रियादक्षो दक्षः क्रतुपतिरधीशस्तनुभृतां,
ऋषीणामार्त्विज्यं शरणद सदस्याः सुर-गणाः।
क्रतुभ्रंशस्त्वत्तः क्रतुफल-विधान-व्यसनिनः,
ध्रुवं कर्तुं श्रद्धा विधुरमभिचाराय हि मखाः।। २१।।
ऋषीणामार्त्विज्यं शरणद सदस्याः सुर-गणाः।
क्रतुभ्रंशस्त्वत्तः क्रतुफल-विधान-व्यसनिनः,
ध्रुवं कर्तुं श्रद्धा विधुरमभिचाराय हि मखाः।। २१।।
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भावार्थ: हे शरणद! राजा दक्ष स्वयं कर्मकांड में अति निपुण थे, महर्षिगण पुरोहित थे और समस्त देवगण सदस्य थे। फिर भी आपने उस विशाल महायज्ञ का विध्वंस कर दिया, क्योंकि उसमें आपका अनादर किया गया था। आप यह सिद्ध करते हैं कि भक्ति, श्रद्धा और विनम्रता से रहित कोई भी विशाल अनुष्ठान केवल अभिचार (अहंकार) बन जाता है और उसका परिणाम विनाशकारी ही होता है।
प्रजानाथं नाथ प्रसभमभिकं स्वां दुहितरं,
गतं रोहिद् भूतां रिरमयिषुमृष्यस्य वपुषा।
धनुष्पाणेर्यातं दिवमपि सपत्राकृतममु,
त्रसन्तं तेऽद्यापि त्यजति न मृगव्याधरभसः।। २२।।
गतं रोहिद् भूतां रिरमयिषुमृष्यस्य वपुषा।
धनुष्पाणेर्यातं दिवमपि सपत्राकृतममु,
त्रसन्तं तेऽद्यापि त्यजति न मृगव्याधरभसः।। २२।।
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भावार्थ: हे शंकर! जब प्रजापति ब्रह्मा मोहवश हिरणी बनी अपनी ही पुत्री के पीछे मृगरूप धरकर दौड़ पड़े, तब आपने मर्यादा की रक्षा हेतु व्याध रूप धारण कर उन पर बाण साधा। आपके उस रौद्र और न्यायप्रिय स्वरूप से भयभीत होकर वे आकाश में भाग गए, किंतु आपका वह धनुर्धारी रूप आज भी मृगशिरा नक्षत्र के रूप में उन्हें अधर्म के प्रति सचेत करता प्रतीत होता है।
स्वलावण्याशंसा धृतधनुषमह्नाय तृणवत्,
पुरः प्लुष्टं दृष्ट्वा पुरमथन पुष्पायुधमपि।
यदि स्त्रैणं देवी यमनिरत-देहार्ध-घटनात्,
अवैति त्वामद्धा बत वरद मुग्धा युवतयः।। २३।।
पुरः प्लुष्टं दृष्ट्वा पुरमथन पुष्पायुधमपि।
यदि स्त्रैणं देवी यमनिरत-देहार्ध-घटनात्,
अवैति त्वामद्धा बत वरद मुग्धा युवतयः।। २३।।
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भावार्थ: हे पुरमथन! जब कामदेव ने आपकी साधना भंग करनी चाही, तो आपने उसे तृण की भांति भस्म कर दिया। यदि इसके उपरांत भी भगवती पार्वती स्वयं को आपके अर्धनारीश्वर रूप का आधा अंग देखकर यह मानती हैं कि आप उनके रूप पर मुग्ध हैं, तो यह उनका निष्पाप स्त्री-सुलभ भाव ही है। वास्तव में, जो कामाग्नि को भस्म कर चुका हो, उसे कोई मोह कैसे बाँध सकता है?
श्मशानेष्वाक्रीडा स्मरहर पिशाचाः सहचराः,
चिता-भस्मालेपः स्रगपि नृकरोटी-परिकरः।
अमंगल्यं शीलं तव भवतु नामैवमखिलं,
तथापि स्मर्तॄणां वरद परमं मंगलमसि।। २४।।
चिता-भस्मालेपः स्रगपि नृकरोटी-परिकरः।
अमंगल्यं शीलं तव भवतु नामैवमखिलं,
तथापि स्मर्तॄणां वरद परमं मंगलमसि।। २४।।
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भावार्थ: हे स्मरहर! आपका निवास श्मशान में है, भूत-पिशाच आपके गण हैं, चिताभस्म आपका अनुलेप है और नर-मुंडों की माला आपका आभूषण है। बाह्य दृष्टि से आपका यह स्वरूप अत्यंत अनामंगलकारी और भयावह प्रतीत होता है, किंतु हे वरदाता! जो भी निष्काम भाव से आपका स्मरण करता है, उसके लिए आप परम मंगल, कल्याण और मोक्ष के दाता बन जाते हैं।
मनः प्रत्यक् चित्ते सविधमविधायात्त-मरुतः,
प्रहृष्यद्रोमाणः प्रमद-सलिलोत्संगति-दृशः।
यदालोक्याह्लादं ह्रद इव निमज्यामृतमये,
दधत्यन्तस्तत्त्वं किमपि यमिनस्तत् किल भवान्।। २५।।
प्रहृष्यद्रोमाणः प्रमद-सलिलोत्संगति-दृशः।
यदालोक्याह्लादं ह्रद इव निमज्यामृतमये,
दधत्यन्तस्तत्त्वं किमपि यमिनस्तत् किल भवान्।। २५।।
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भावार्थ: हे योगेश्वर! योगी पुरुष अपनी इंद्रियों को अंतर्मुखी कर, प्राणवायु को सिद्ध करके, आनंद से रोमांचित हो और अश्रुपात करते हुए जिस अनिर्वचनीय, चिदानंदमय अमृत-सागर में गोते लगाते हैं और जिस परम तत्त्व का साक्षात्कार अपने अंतःकरण में करते हैं—वह साक्षात् आप ही हैं।
त्वमर्कस्त्वं सोमस्त्वमसि पवनस्त्वं हुतवहः,
त्वमापस्त्वं व्योम त्वमु धरणिरात्मा त्वमिति च।
परिच्छिन्नामेवं त्वयि परिणता बिभ्रतु गिरं,
न विद्मस्तत्तत्त्वं वयमिह तु यत्वं न भवसि।। २६।।
त्वमापस्त्वं व्योम त्वमु धरणिरात्मा त्वमिति च।
परिच्छिन्नामेवं त्वयि परिणता बिभ्रतु गिरं,
न विद्मस्तत्तत्त्वं वयमिह तु यत्वं न भवसि।। २६।।
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भावार्थ: आप ही सूर्य, चंद्रमा, वायु, अग्नि, जल, आकाश, पृथ्वी और आत्मा हैं। ज्ञानीजन अष्टमूर्ति रूप में आपकी सीमित व्याख्या करते रहें, किंतु हे प्रभु! हम तो पूरे ब्रह्मांड में ऐसा कोई तत्त्व ही नहीं जानते, जो साक्षात् आपका ही स्वरूप न हो। आप ही सर्वत्र व्याप्त परिपूर्ण सत्ता हैं।
त्रयीं तिस्रो वृत्तीस्त्रिभुवनमथो त्रीनपि सुरान्,
अकाराद्यैर्वर्णैस्त्रिभिरभिदधत् तीर्णविकृति।
तुरीयं ते धाम ध्वनिभिरवरुन्धानमणुभिः,
समस्त-व्यस्तं त्वां शरणद गृणात्योमिति पदम्।। २७।।
अकाराद्यैर्वर्णैस्त्रिभिरभिदधत् तीर्णविकृति।
तुरीयं ते धाम ध्वनिभिरवरुन्धानमणुभिः,
समस्त-व्यस्तं त्वां शरणद गृणात्योमिति पदम्।। २७।।
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भावार्थ: हे शरणद! 'ॐ' (ओंकार) के अ, उ, म—ये तीन वर्ण तीन वेद (ऋग्, यजुः, साम), तीन अवस्थाएँ (जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति), तीन लोक और तीन देवों को दर्शाते हैं। किंतु इन सबसे परे जो आपका अमात्रिक, गुणातीत और परम शाश्वत 'तुरीय' धाम है, वह ओंकार की सूक्ष्म नाद-ध्वनि में समाहित है। 'ॐ' शब्द समष्टि और व्यष्टि रूप में केवल आपकी ही वंदना करता है।
भवः शर्वो रुद्रः पशुपतिरथोग्रः सहमहान्,
तथा भीमेशानाविति यदभिधानाष्टकमिदम्।
अमुष्मिन् प्रत्येकं प्रविचरति देव श्रुतिरपि,
प्रियायास्मैधाम्ने प्रणिहित-नमस्योऽस्मि भवते।। २८।।
तथा भीमेशानाविति यदभिधानाष्टकमिदम्।
अमुष्मिन् प्रत्येकं प्रविचरति देव श्रुतिरपि,
प्रियायास्मैधाम्ने प्रणिहित-नमस्योऽस्मि भवते।। २८।।
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भावार्थ: वेद भी आपके इन आठ अष्टमूर्ति दिव्य नामों का निरंतर गान करते हैं—भव, शर्व, रुद्र, पशुपति, उग्र, महादेव, भीम और ईशान। हे देव! आपके इन परम प्रिय, ऐश्वर्यशाली और पावन नामों के धाम स्वरूपआपको मैं बारंबार नतमस्तक होकर प्रणाम करता हूँ।
नमो नेदिष्ठाय प्रियदव दविष्ठाय च नमः,
नमः क्षोदिष्ठाय स्मरहर महिष्ठाय च नमः।
नमो वर्षिष्ठाय त्रिनयन यविष्ठाय च नमः,
नमः सर्वस्मै ते तदिदमतिसर्वाय च नमः।। २९।।
नमः क्षोदिष्ठाय स्मरहर महिष्ठाय च नमः।
नमो वर्षिष्ठाय त्रिनयन यविष्ठाय च नमः,
नमः सर्वस्मै ते तदिदमतिसर्वाय च नमः।। २९।।
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भावार्थ: हे एकांतप्रिय! आप दूर से भी दूर हैं और हृदय के अत्यंत निकट भी। हे कामारि! आप अणु से भी सूक्ष्म हैं और ब्रह्मांड से भी विशाल। हे त्रिनेत्र! आप सबसे वयोवृद्ध (सनातन) हैं और नित्य युवा भी। आप सर्वस्वरूपी भी हैं और इस दृश्य जगत् से परे अतीन्द्रिय भी। ऐसे सर्वव्यापी परमेश्वर को मेरा बारंबार नमन है।
बहुल-रजसे विश्वोत्पत्तौ, भवाय नमो नमः,
प्रबल-तमसे तत् संहारे, हराय नमो नमः।
जन-सुखकृते सत्त्वोद्रिक्तौ, मृडाय नमो नमः,
प्रमहसि पदे निस्त्रैगुण्ये, शिवाय नमो नमः।। ३०।।
प्रबल-तमसे तत् संहारे, हराय नमो नमः।
जन-सुखकृते सत्त्वोद्रिक्तौ, मृडाय नमो नमः,
प्रमहसि पदे निस्त्रैगुण्ये, शिवाय नमो नमः।। ३०।।
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भावार्थ: रजोगुण को अंगीकार कर जगत् की सृष्टि करने वाले आपके 'भव' (ब्रह्मा) रूप को प्रणाम! तमोगुण को धारण कर जगत् का संहार करने वाले आपके 'हर' (रुद्र) रूप को प्रणाम! सत्वगुण से प्रजा का पालन-पोषण कर सुख देने वाले आपके 'मृड' (विष्णु) रूप को नमस्कार है! और इन तीनों गुणों से परे, स्वयं के ज्योतिर्मय परम पद में स्थित आपके निष्कल 'शिव' स्वरूप को मेरा पुनः-पुनः प्रणाम!
कृश-परिणति-चेतः क्लेशवश्यं क्व चेदं,
क्व च तव गुण-सीमोल्लंघिनी शश्वदृद्धिः।
इति चकितममन्दीकृत्य मां भक्तिराधाद्,
वरद चरणयोस्ते वाक्य-पुष्पोपहारम्।। ३१।।
क्व च तव गुण-सीमोल्लंघिनी शश्वदृद्धिः।
इति चकितममन्दीकृत्य मां भक्तिराधाद्,
वरद चरणयोस्ते वाक्य-पुष्पोपहारम्।। ३१।।
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भावार्थ: कहाँ तो क्लेशों और संशयों से घिरा मेरा यह अल्पज्ञ, अत्यंत चंचल चित्त, और कहाँ आपकी अनंत, सीमाहीन महिमा! इस विशाल अंतर को देखकर मेरा मन ठिठक जाता है, किंतु आपके प्रति मेरे हृदय में उमड़ती भक्ति मुझे सहसा सम्हाल लेती है। हे वरद! इसी अनन्य भक्ति की प्रेरणा से मैं यह शब्द-पुष्पों की माला आपके श्रीचरणों में समर्पित कर रहा हूँ।
असित-गिरि-समं स्यात् कज्जलं सिन्धु-पात्रे,
सुर-तरुवर-शाखा लेखनी पत्रमुर्वी।
लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालं,
तदपि तव गुणानामीश पारं न याति।। ३२।।
सुर-तरुवर-शाखा लेखनी पत्रमुर्वी।
लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालं,
तदपि तव गुणानामीश पारं न याति।। ३२।।
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भावार्थ: हे परमेश्वर! यदि विशाल काजल के पर्वत की स्याही बनाई जाए, समुद्र को दवात बनाया जाए, कल्पवृक्ष की शाखा को लेखनी और संपूर्ण पृथ्वी को कागज़ बना दिया जाए—और स्वयं सर्वज्ञानमयी माँ सरस्वती अनंत काल तक लिखती रहें, तब भी आपके अगणित गुणों और महिमा का पार पाना असंभव है।
असुर-सुर-मुनीन्द्रैरर्चितस्येन्दु-मौलेः,
ग्रथित-गुणमहिम्नो निर्गुणस्येश्वरस्य।
सकल-गण-वरिष्ठः पुष्पदन्ताभिधानः,
रुचिरमलघुवृत्तैः स्तोत्रमेतच्चकार।। ३३।।
ग्रथित-गुणमहिम्नो निर्गुणस्येश्वरस्य।
सकल-गण-वरिष्ठः पुष्पदन्ताभिधानः,
रुचिरमलघुवृत्तैः स्तोत्रमेतच्चकार।। ३३।।
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भावार्थ: सुर, असुर और मुनियों द्वारा पूजित, मस्तक पर बालचंद्र धारण करने वाले, निर्गुण और सगुण रूप वाले परमेश्वर शिव की इस दिव्य महिमा से भावविभोर होकर, गंधर्वों के श्रेष्ठ राजा पुष्पदंत ने इस असीम, ललित और पावन स्तोत्र की रचना की है।
अहरहरनवद्यं धूर्जटेः स्तोत्रमेतत्,
पठति परमभक्त्या शुद्ध-चित्तः पुमान् यः।
स भवति शिवलोके रुद्रतुल्यस्तथाऽत्र,
प्रचुरतर-धनायुः पुत्रवान् कीर्तिमांश्च।। ३४।।
पठति परमभक्त्या शुद्ध-चित्तः पुमान् यः।
स भवति शिवलोके रुद्रतुल्यस्तथाऽत्र,
प्रचुरतर-धनायुः पुत्रवान् कीर्तिमांश्च।। ३४।।
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भावार्थ: जो मनुष्य निर्मल चित्त और अनन्य भक्ति-भाव से नित्य भगवान धूर्जटी के इस स्तोत्र का पाठ करता है, वह इस लोक में दीर्घायु, विपुल धन, सुयोग्य संतान और अक्षय कीर्ति प्राप्त करता है। तत्पश्चात् देहांत के उपरांत वह शिवलोक को प्राप्त होकर स्वयं रुद्र तुल्य परम शांति और आनंद का भागी बनता है।
महेशान्नापरो देवो महिम्नो नापरा स्तुतिः।
अघोरान्नापरो मन्त्रो नास्ति तत्त्वं गुरोः परम्।। ३५।।
अघोरान्नापरो मन्त्रो नास्ति तत्त्वं गुरोः परम्।। ३५।।
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भावार्थ: भगवान महेश से बढ़कर कोई देव नहीं है, शिवमहिम्न स्तोत्र से श्रेष्ठ कोई स्तुति नहीं है, अघोर मंत्र (शिव नाम) से बढ़कर कोई मंगलकारी मंत्र नहीं है और श्रीगुरुदेव से बढ़कर संसार में कोई पूजनीय तत्त्व नहीं है।
दीक्षा दानं तपस्तीर्थं ज्ञानं यागादिकाः क्रियाः।
महिम्नस्तव पाठस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्।। ३६।।
महिम्नस्तव पाठस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्।। ३६।।
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भावार्थ: अनेक प्रकार की दीक्षाएँ, दान, कठोर तपस्या, समस्त तीर्थयात्राएँ, शास्त्रों का ज्ञान और बड़े-बड़े यज्ञ अनुष्ठान—ये सब मिलकर भी शिवमहिम्न स्तोत्र के पाठ से मिलने वाले अगाध पुण्य के सोलहवें अंश (कला) के बराबर भी नहीं हो सकते।
कुसुमदशन-नामा सर्व-गन्धर्व-राजः,
शशिधरवर-मौलेर्देवदेवस्य दासः।
स खलु निज-महिम्नो भ्रष्ट एवास्य रोषात्,
स्तवनमिदमकार्षीद् दिव्य-दिव्यं महिम्नः।। ३७।।
शशिधरवर-मौलेर्देवदेवस्य दासः।
स खलु निज-महिम्नो भ्रष्ट एवास्य रोषात्,
स्तवनमिदमकार्षीद् दिव्य-दिव्यं महिम्नः।। ३७।।
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भावार्थ: कुसुमदंत (पुष्पदंत) नाम का गंधर्वराज चंद्रमौलेश्वर भगवान शिव का अनन्य सेवक था। अनजाने में हुए अपराध के कारण शिवजी के कोप से जब उसकी दिव्य शक्तियां क्षीण हो गईं, तब खोए हुए सिद्धत्व को पुनः प्राप्त करने और प्रभु को प्रसन्न करने हेतु उसने इस अलौकिक 'महिम्न स्तोत्र' की रचना की।
सुरवरमुनिपूज्य स्वर्ग-मोक्षैक-हेतुं,
पठति यदि मनुष्यः प्रांजलिर्नान्य-चेताः।
व्रजति शिव-समीपं किन्नरैः स्तूयमानः,
स्तवनमिदममोघं पुष्पदन्तप्रणीतम्।। ३८।।
पठति यदि मनुष्यः प्रांजलिर्नान्य-चेताः।
व्रजति शिव-समीपं किन्नरैः स्तूयमानः,
स्तवनमिदममोघं पुष्पदन्तप्रणीतम्।। ३८।।
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भावार्थ: देवताओं और ऋषियों द्वारा पूजित, स्वर्ग और मोक्ष प्रदान करने वाले इस स्तोत्र का जो मनुष्य हाथ जोड़कर, एकाग्रचित्त होकर पाठ करता है, वह किन्नरों द्वारा प्रशंसित होकर अंततः भगवान शिव के परम पद को प्राप्त करता है। पुष्पदंत द्वारा रचित यह स्तोत्र अमोघ और निश्चित फलदायी है।
आसमाप्तमिदं स्तोत्रं पुण्यं गन्धर्व-भाषितम्।
अनौपम्यं मनोहारि सर्वमीश्वरवर्णनम्।। ३९।।
अनौपम्यं मनोहारि सर्वमीश्वरवर्णनम्।। ३९।।
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भावार्थ: गंधर्वराज पुष्पदंत द्वारा रचित, भगवान शिव के दिव्य गुणों से सुशोभित, अतुलनीय, अत्यंत मनमोहक और परम पुण्य प्रदान करने वाला यह संपूर्ण ईश्वर-वर्णन स्तोत्र यहाँ पूर्ण होता है।
इत्येषा वाङ्मयी पूजा श्रीमच्छंकर-पादयोः।
अर्पिता तेन देवेशः प्रीयतां में सदाशिवः।। ४०।।
अर्पिता तेन देवेशः प्रीयतां में सदाशिवः।। ४०।।
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भावार्थ: वाणी के माध्यम से रचित यह भावपूर्ण स्तुति-रुपी पूजा मैं श्रद्धापूर्वक भगवान श्रीशंकर के पावन चरणकमलों में अर्पित करता हूँ। हे देवेश! हे सदाशिव! आप मुझ पर नित्य प्रसन्न रहें और अपनी अहैतुकी कृपा बनाए रखें।
तव तत्त्वं न जानामि कीदृशोऽसि महेश्वर।
यादृशोऽसि महादेव तादृशाय नमो नमः।। ४१।।
यादृशोऽसि महादेव तादृशाय नमो नमः।। ४१।।
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भावार्थ: हे महेश्वर! मैं आपके वास्तविक, गूढ़ और परम तत्त्व को नहीं जानता कि आप वास्तव में कैसे हैं। हे महादेव! आप जैसे भी हैं, जिस रूप में भी हैं, मेरे भावग्राही प्रभु—आपके उसी पावन स्वरूप को मेरा बारंबार सहर्ष प्रणाम है।
एककालं द्विकालं वा त्रिकालं यः पठेन्नरः।
सर्वपाप-विनिर्मुक्तः शिव लोके महीयते।। ४२।।
सर्वपाप-विनिर्मुक्तः शिव लोके महीयते।। ४२।।
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भावार्थ: जो मनुष्य प्रतिदिन नियमपूर्वक इस स्तोत्र का एक समय (प्रातः), दो समय (प्रातः-सायं) अथवा तीनों काल पाठ करता है, वह समस्त ज्ञात-अज्ञात पापों और बंधनों से मुक्त होकर अंततः शिवलोक में पूजित और आनंदित होता है।
श्री पुष्पदन्त-मुख-पंकज-निर्गतेन,
स्तोत्रेण किल्बिष-हरेण हर-प्रियेण।
कण्ठस्थितेन पठितेन समाहितेन,
सुप्रीणितो भवति भूतपतिर्महेशः।। ४३।।
स्तोत्रेण किल्बिष-हरेण हर-प्रियेण।
कण्ठस्थितेन पठितेन समाहितेन,
सुप्रीणितो भवति भूतपतिर्महेशः।। ४३।।
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भावार्थ: पुष्पदंत के मुख-कमल से निसृत, समस्त पापों का शमन करने वाली और भगवान हर को अत्यंत प्रिय इस स्तुति को जो कंठस्थ करता है, एकाग्र होकर पढ़ता है या प्रेमपूर्वक सुनता भी है, उस पर भूतभावन महादेव सदाशिव अत्यंत प्रसन्न होते हैं और उसकी समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण करते हैं।
॥ इति श्री पुष्पदन्त विरचितं शिवमहिम्नः स्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

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