अन्वय-शिक्षणम् (श्लोकान्वयविधिः)
(दण्डान्वयविधिः खण्डान्वयविधिः च — नियम-सोपान-सहितम्)
१. अन्वय-परिचयः स्वरूपं च [पृष्ठ - १६१]
सामान्यतः श्लोकों में पद्य-रचना अथवा छन्द के नियम के अनुसार कर्तृपद, कर्मपद, तृतीयादि-विभक्त्यन्त पद, विशेषण एवं क्रियापद आगे-पीछे प्रयुक्त होते हैं। इस कारण श्लोक के वास्तविक अर्थ और भाव को समझने के लिए पदों के परस्पर सम्बन्ध (अन्वय) को जानना आवश्यक होता है।
- दण्डान्वयविधिः (दण्डवत् अन्वयः दण्डान्वयः — वाक्यरचना-क्रमेण अन्वयः)
- खण्डान्वयविधिः (आकाङ्क्षाविधिः — प्रश्नोत्तरमाध्यमेन खण्डशः अन्वयः)
२. दण्डान्वयविधिः (नियमः उदाहरणं च) [पृष्ठ - १६१-१६३]
क्त्वा-णमुल-ल्यप्-प्रभृत्यैवं पूर्वं दण्डान्वये भवेत् ॥ [पृष्ठ - १६१]
सरलार्थ: दण्डान्वय में सबसे पहले विशेषण, उसके बाद विशेष्य, फिर क्त्वा, ल्यप् आदि कृदन्त अव्ययों तथा तृतीयादि कारक पदों को जोड़ते हुए अंत में क्रियापद को दण्ड (सीधी रेखा) के समान व्याकरणिक क्रम में व्यवस्थित किया जाता है।
दण्डान्वय-उदाहरण-श्लोकः [पृष्ठ - १६२]:
सुचिन्तितं चौषधमातुराणां न नाममात्रेण करोत्यरोगम् ॥
३. खण्डान्वयविधिः सहकारिकारणानि च [पृष्ठ - १६३-१६६]
किमो रूपं पुरस्कृत्य तृतीयादीनि योजयेत् ॥
ल्यबन्तञ्च तुमुन्तञ्च क्त्वान्तं कर्मविभूषितम् ।
अन्वयस्थपदानाञ्च यथा लिङ्गविशेषणे ॥ [पृष्ठ - १६३]
सरलार्थ: खण्डान्वय में श्लोक के पूरे भाग को एक साथ न जोड़कर, क्रियापद को मुख्य रखकर 'किम्' (कः, किम्, केन, कस्मै आदि) शब्दों से लघु प्रश्नोत्तर के माध्यम से पदों को खंड-खंड जोड़ते हैं। इसे 'आकाङ्क्षाविधि' भी कहते हैं।
अन्वय एवं अर्थबोध के ४ अनिवार्य सहकारि-कारण [पृष्ठ - १६३-१६४]:
- १. आकाङ्क्षा: अपेक्षित पद या अर्थ को जानने की इच्छा। जैसे— 'पठति' क्रिया सुनकर 'कः पठति?', 'किं पठति?' आदि जिज्ञासा होना।
- २. योग्यता: पदों के बीच परस्पर सम्बन्ध की स्वाभाविक क्षमता। जैसे— 'गगने पुष्पं विकसति' में योग्यता का अभाव है क्योंकि आकाश में फूल नहीं खिलते।
- ३. आसत्तिः (सन्निधिः): पदों का परस्पर निकट उच्चारण। यदि एक शब्द बोलकर दूसरा शब्द बहुत देर बाद बोला जाए, तो आसत्ति के अभाव में अन्वय नहीं होता।
- ४. तात्पर्यम्: प्रसंगानुकूल अभीष्ट अर्थ का बोध। जैसे— 'शतायुर्भव' का वास्तविक तात्पर्य 'सौ वर्ष की गिनती' नहीं अपितु 'चिरञ्जीवी भव' (दीर्घायु हो) है।
खण्डान्वय-प्रश्नोत्तर-प्रक्रिया [पृष्ठ - १६५-१६६]:
विद्वान् कुलीनो न करोति गर्वमल्पो जनो जल्पति साट्टहासम् ॥
| चरणः | शिक्षकस्य आकाङ्क्षा-प्रश्नाः | छात्राणाम् उत्तराणि |
|---|---|---|
| प्रथमचरणे | क्रियापदं किम्? / कः न करोति? / किं न करोति? | करोति / सम्पूर्णकुम्भः / शब्दं न करोति |
| द्वितीयचरणे | क्रियापदं किम्? / कीदृशः घटः? / किं कथम् उपैति? | उपैति / अर्धः घटः / घोषं नूनम् उपैति |
| तृतीयचरणे | क्रियापदं किम्? / कीदृशः विद्वान्? / किं न करोति? | करोति / कुलीनः विद्वान् / गर्वं न करोति |
| चतुर्थचरणे | क्रियापदं किम्? / कीदृशः जनः? / कथं जल्पति? | जल्पति / अल्पः जनः / साट्टहासं जल्पति |
४. व्याकरणिक-घटकाः (सारण्यः)
(क) कठिन-शब्दार्थ-सारणी
| क्र.सं. | कठिन शब्द | संस्कृत व्याख्या | हिन्दी अर्थ | English Meaning |
|---|---|---|---|---|
| १ | अन्वयः | पदानां परस्परसम्बन्धः | पदों का क्रमबद्ध सम्बन्ध | Syntax / Sentence Order |
| २ | अध्याहार्यम् | लुप्तपदस्य योजनम् | छिपे हुए पद को बाहर से जोड़ना | Supplying missing words |
| ३ | आतुराणाम् | रोगिणाम् / व्याधिग्रस्तानाम् | रोगियों का / बीमारों का | Of the sick / patients |
| २ | घोषम् | ध्वनिम् / शब्दम् | गंभीर आवाज या ध्वनि | Loud sound / noise |
| ५ | जल्पति | वृथा प्रलापं करोति | व्यर्थ बड़बड़ाता है / बोलता है | Prattles / Babbles |
| ६ | साट्टहासम् | अट्टहासेन सह (उच्चहासेन) | ठहाके के साथ / जोर की हंसी | With loud laughter |
(ख) पाठगत क्रियापद-सारणी
| क्र.सं. | क्रियापदम् | मूल धातु | लकार-पुरुष-वचन | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|---|---|
| १ | भवन्ति | भू (सत्तायाम्) | लट्. प्र.पु. बहुवचनम् | होते हैं |
| २ | करोति | कृ (करणे) | लट्. प्र.पु. एकवचनम् | करता है |
| ३ | उपैति | उप + इण् (गतौ) | लट्. प्र.पु. एकवचनम् | प्राप्त होता है / करता है |
| ४ | जल्पति | जल्पँ (व्यक्तायां वाचि) | लट्. प्र.पु. एकवचनम् | बोलता है / बकता है |
| ५ | शक्नुवन्ति | शक् (शक्तौ) | लट्. प्र.पु. बहुवचनम् | समर्थ होते हैं |
(ग) अव्यय-उपसर्ग-प्रत्यय-सारणी
| घटक-प्रकारः | पदम् | संयोजनम् / विवरणम् | अर्थः |
|---|---|---|---|
| कृदन्तः | अधीत्य | अधि (उपसर्गः) + इङ् + ल्यप् | पढ़कर |
| कृदन्तः | पुरस्कृत्य | पुरस् + कृ + ल्यप् | आगे रखकर / आधार बनाकर |
| मतुबर्थीयः | क्रियावान् | क्रिया + मतुप् (वत्) | कर्मशील / आचरणयुक्त |
| अव्ययम् | नूनम् | निश्चयार्थक अव्ययम् | निश्चय ही / अवश्य |
| अव्ययम् | तु / अपि / न | मूल अव्ययानि | तो / भी / नहीं |
(घ) पाणिनीय / पाठगत सन्धि-सारणी
| क्र.सं. | सन्धि-पदम् | विच्छेदः | सन्धि-नाम (नियमः) |
|---|---|---|---|
| १ | शास्त्राण्यधीत्यापि | शास्त्राणि + अधीत्य + अपि | यण्-सन्धिः + दीर्घ-सन्धिः |
| २ | पुरुषस्विद्वान् | पुरुषः + सः + विद्वान् | सत्व-विसर्गसन्धिः + विसर्गलोपः |
| ३ | चौषधम् | च + औषधम् | वृद्धि-स्वरसन्धिः |
| ४ | घोषमुपैति | घोषम् + उपैति (उप + एति) | व्यञ्जन-संयोगः + वृद्धि-सन्धिः |
| ५ | शतायुर्भव | शतायुः + भव | रुत्व-विसर्गसन्धिः |
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