समास-प्रकरणम् (समास-शिक्षा)
(समास-लक्षणम्, विग्रह-प्रकारौ, पद-प्राधान्यम्, चतुर्विध-समास-विवेचनं च)
१. समास-स्वरूपं लक्षणं च [पृष्ठ - १६७]
समास के आधारभूत नियम [पृष्ठ - १६७-१६८]:
- सुबन्त-संयोगः: समास सामान्यतः परस्पर सम्बद्ध (अन्वित) दो सुबन्त पदों के मध्य होता है (यथा — सीतायाः पतिः = सीतापतिः)।
- अन्वय-अनिवार्यता: यदि पदों में परस्पर सम्बन्ध (अन्वय) न हो, तो समास नहीं होता। (यथा— 'भवति दर्शनं राज्ञः, पुत्रः कृषकस्य गच्छति' में 'राज्ञः' का 'पुत्रः' के साथ अन्वय न होने से समास नहीं होगा)।
- पूर्वपद-उत्तरपद-व्यवस्था: पहले प्रयुक्त पद 'पूर्वपद' (सीता) तथा बाद का पद 'उत्तरपद' (पतिः) कहलाता है।
- सुप्-लोपः: समास होने पर पूर्वपद और उत्तरपद प्रातिपदिक बनकर अपनी विभक्तियों (ङस्, सु आदि) का लोप करते हैं, तदनन्तर समस्तपद से पुनः विभक्ति लगाई जाती है (सीता + ङस् + पति + सु → सीतापतिः)।
२. विग्रहवाक्यम् तस्य प्रकारौ च [पृष्ठ - १६८-१६९]
विग्रहवाक्य-लक्षणम्: "वृत्त्यर्थस्य अवबोधकं वाक्यं विग्रहः।" अर्थात् समस्तपद के अर्थ का बोध कराने वाले वाक्य को विग्रह कहते हैं (यथा — 'राष्ट्रस्य नायकः' इति विग्रहः, 'राष्ट्रनायकः' इति समस्तपदम्)।
जब समास का विग्रह उसी समस्तपद में उपस्थित पदों द्वारा ही किया जाए।
उदाहरणम्: सुदामा कृष्णसखा अस्ति → कृष्णस्य सखा = कृष्णसखा।
जब समास का विग्रह समस्तपद के पदों को छोड़कर अन्य (बाहरी) पदों के माध्यम से किया जाए (नित्यसमास में)।
उदाहरणम्: बालः यथामति कार्यं करोति → मतिम् अनतिक्रम्य = यथामति ('अनतिक्रम्य' पद समस्तपद में नहीं है)।
३. पद-प्राधान्येन समास-निर्णयः [पृष्ठ - १६९-१७१]
प्रायेण उत्तरपदार्थप्रधानः तत्पुरुषः (कर्मधारय-द्विगु-सहितः) ।
प्रायेण अन्यपदार्थप्रधानः बहुव्रीहिः ।
प्रायेण उभयपदार्थप्रधानः द्वन्द्वः ॥
💡 विशेष टिप्पणी: केवलसमासः विशेषसमासश्च (पाणिनीय-समास-वर्गीकरणम्) [पृष्ठ - १६९, १७१-१७२]
१. केवलसमासः: जो तत्पुरुषादि विशेष संज्ञाओं से विनिर्मुक्त होकर केवल 'समास' नाम धारण करता है। यथा— भूतपूर्वः (पूर्वं भूत = भूतपूर्वः)।
२. तत्पुरुष के उपभेद:
• कर्मधारयः: तत्पुरुष का ही समानाधिकरण भेद है (विशेषण-विशेष्य / उपमान-उपमेय)। यथा— नीलमेघः, मुखकमलम्।
• द्विगुः: संख्यापूर्व कर्मधारय को द्विगु कहते हैं। यथा— त्रिलोकी, पञ्चगवम्।
• नञ्-तत्पुरुषः: अभाव/निषेध अर्थ में (न धर्मः = अधर्मः)।
४. समासानां प्रमुखाः भेदाः उदाहरणानि च [पृष्ठ - १७१-१७६]
(क) विभक्ति-तत्पुरुषसमासः (षड्विधः) [पृष्ठ - १७१]
(ख) द्वन्द्वसमासः (द्विविधः) [पृष्ठ - १७३]
- इतरेतर-द्वन्द्वः: पदों की अपनी प्रधानता रहती है और वचन पदों की संख्यानुसार होता है। (उदा. रामश्च कृष्णश्च = रामकृष्णौ; रामश्च कृष्णश्च सुरेशश्च = रामकृष्णसुरेशाः)
- समाहार-द्वन्द्वः: पदों का समूह प्रधान होकर नित्य नपुंसकलिंग एकवचन में रहता है। (उदा. पाणी च पादौ च एषां समाहारः = पाणिपादम्; संज्ञा च परिभाषा च = संज्ञापरिभाषम्)
(ग) बहुव्रीहिसमासः (सामान्यः विशेषश्च) [पृष्ठ - १७४-१७५]
(घ) अव्ययीभावसमासस्य प्रमुखाः अर्थाः [पृष्ठ - १७५-१७६]
५. व्याकरणिक-घटकाः (सारण्यः)
(क) कठिन-शब्दार्थ-सारणी [पृष्ठ - १६७-१७६]
| क्र.सं. | कठिन शब्द | संस्कृत व्याख्या | हिन्दी अर्थ | English Meaning |
|---|---|---|---|---|
| १ | समसनम् | संक्षेपीकरणम् / एकीभवनम् | संक्षिप्त करना / मिलना | Compounding / Condensation |
| २ | सुबन्तम् | सुप्-प्रत्ययान्तानि नामपदानि | विभक्तियुक्त शब्द/संज्ञापद | Inflected Noun |
| ३ | अन्वितम् | सम्बद्धम् / युक्तम् | आपस में सम्बद्ध | Syntactically connected |
| ४ | प्रातिपदिकम् | विभक्तिरहितः मूलशब्दः | मूल शब्द (प्रातिपदिक) | Crude / Base form of a noun |
| ५ | वीप्सा | व्याप्तिः / पुनः पुनः आवृत्तिः | बार-बार होना (पुनरावृत्ति) | Repetition / Pervasion |
(ख) पाठगत क्रियापद-सारणी
| क्र.सं. | क्रियापदम् | मूल धातु | लकार-पुरुष-वचन | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|---|---|
| १ | भवति | भू (सत्तायाम्) | लट्. प्र.पु. एकवचनम् | होता है |
| २ | गच्छति / गच्छतः | गम् (गतौ) | लट्. प्र.पु. (एक./द्विवचनम्) | जाता है / दोनों जाते हैं |
| ३ | प्रवहति | प्र + वह् (प्रापणे) | लट्. प्र.पु. एकवचनम् | बहती है |
| ४ | परिशीलयामः | परि + शील् | लट्. उ.पु. बहुवचनम् | हम सब अवलोकन करते हैं |
| ५ | व्यवह्रियते | वि + अव + हृ (कर्मणि) | लट्. प्र.पु. एकवचनम् | व्यवहार किया जाता है / कहा जाता है |
(ग) अव्यय-उपसर्ग-प्रत्यय-सारणी
| घटक-प्रकारः | पदम् | संरचना / विवरणम् | अर्थः |
|---|---|---|---|
| अव्ययम् | युगपत् | कालवाचक अव्ययम् | एक साथ |
| अव्ययम् | यदि ... तर्हि | सम्बन्धवाचक अव्यय-युगलम् | यदि ... तो |
| कृदन्तः | मिलित्वा | मिल् + क्त्वा | मिलकर |
| कृदन्तः | विहाय / अनतिक्रम्य | वि + हा + ल्यप् / अन् + अति + क्रम् + ल्यप् | छोड़कर / उल्लंघन न करके |
| कृदन्तः (तुमुन्) | ज्ञातुम् / निश्चेतुम् | ज्ञा + तुमुन् / निस् + चि + तुमुन् | जानने के लिए / निश्चय करने के लिए |
(घ) पाणिनीय / पाठगत सन्धि-सारणी
| क्र.सं. | सन्धि-पदम् | विच्छेदः | सन्धि-नाम (नियमः) |
|---|---|---|---|
| १ | इत्यर्थः | इति + अर्थः | यण् स्वरसन्धिः (इको यणचि) |
| २ | एकैकीभवनमेव | एकीभवनम् + एव | व्यञ्जन-संयोगः |
| ३ | शीतोष्णम् | शीतम् + उष्णम् (शीत + उष्णम्) | गुण स्वरसन्धिः (आद्गुणः) |
| ४ | पीताम्बरः | पीत + अम्बरः | दीर्घ स्वरसन्धिः (अकः सवर्णे दीर्घः) |
| ५ | अत्युत्तमम् / अधोऽधः | अति + उत्तमम् / अधः + अधः | यण्-सन्धिः / उत्व-विसर्गसन्धिः |

0 टिप्पणियाँ