सुखस्य मूलं धर्मः धर्मस्य मूलम् अर्थः
(NCERT शारदा - कक्षा ९ संस्कृत पाठ्यपुस्तक)
पाठ्य-परिचयः (पाठ का परिचय) [पृष्ठ - ९]
भारतीयधर्मशास्त्रेषु अनेकाः सूक्तयः विद्यन्ते, याः मानवजीवनस्य यथार्थतत्त्वं प्रतिपादयन्ति। तेष्वेकं प्रसिद्धं सूत्ररूपं वाक्यं कौटिल्यस्य अर्थशास्त्रे अस्ति - "सुखस्य मूलं धर्मः, धर्मस्य मूलम् अर्थः।" अस्य आशयः अस्ति यत् वास्तविकसुखस्य आधारः धर्मः, धर्मपालनस्य च आधारः अर्थः। अर्थः इत्युक्ते धनं, यत् सर्वविधस्य आजीविकाव्यवहारस्य प्रमुखं साधनम्। जीवने धर्मः, अर्थः, सुखम् इत्येतेषां त्रयाणां परस्परसम्बन्धः अविच्छिन्नः अस्ति।
हिन्दी अनुवाद: भारतीय धर्मशास्त्रों में अनेक सूक्तियाँ हैं, जो मानव जीवन के वास्तविक तत्त्व को प्रतिपादित करती हैं। उनमें से एक प्रसिद्ध सूत्र रूप वाक्य कौटिल्य के अर्थशास्त्र में है - "सुख का मूल धर्म है, और धर्म का मूल अर्थ (धन) है।" इसका आशय यह है कि वास्तविक सुख का आधार धर्म है और धर्म पालन का आधार अर्थ है। अर्थ का तात्पर्य धन से है, जो सभी प्रकार के आजीविका व्यवहार का प्रमुख साधन है। जीवन में धर्म, अर्थ और सुख - इन तीनों का आपसी संबंध अटूट है।
पाठस्य विस्तृत-व्याख्या (पाठ की विस्तृत व्याख्या) [पृष्ठ - ९, १०, ११, १२]
- १. अर्थस्य महत्त्वम् (अर्थ का महत्त्व): सामान्य जीवन में अन्न, वस्त्र, आवास, शिक्षा तथा स्वास्थ्य सेवा जैसी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए धन आवश्यक है। पर्याप्त धन के अभाव में स्वकर्तव्य पालन कठिन हो जाता है।
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२. त्रिविधः आर्थिकव्यवहारः (तीन प्रकार का स्वस्थ आर्थिक व्यवहार):
- न्यायपूर्णम् अर्थोपार्जनम्: सन्मार्ग और ईमानदारी से धन अर्जन करना चाहिए। अनैतिक आर्थिक व्यवहार कभी नहीं करना चाहिए।
- औचित्यपूर्णः व्ययः: आवश्यकतानुसार व्यय करना चाहिए। स्वास्थ्य लाभ, विद्यार्जन तथा आत्मरक्षा के लिए किया गया व्यय ही उचित व्यय है। दिखावटी व व्यसनों पर किया गया व्यय 'अपव्यय' है, जिससे बचना चाहिए।
- भविष्यदृष्ट्या सञ्चयः: कमाए गए धन का कुछ भाग भविष्य की सुरक्षा के लिए बचाना चाहिए। बचत से मनुष्य स्वावलंबी और स्वाभिमानी बनता है।
- ३. छात्रजीवने आर्थिकसाक्षरता (छात्र जीवन में वित्तीय साक्षरता): छात्र प्रायः जिह्वा-लोलुपता (फास्ट फूड, शीतल पेय) तथा दिखावे में माता-पिता के कमाए धन का अपव्यय करते हैं। इससे न केवल धन हानि होती है, अपितु स्वास्थ्य भी बिगड़ता है।
- ४. सर्वकारीय-योजनाः (सरकारी बचत योजनाएं): धन संचय और सुरक्षित निवेश के लिए डाकघर व बैंकों में अनेक योजनाएं उपलब्ध हैं—जैसे प्रधानमंत्री जन-धन योजना, सुकन्या समृद्धि योजना, सार्वजनिक भविष्य निधि (PPF), राष्ट्रीय बचत पत्र (NSC), किसान विकास पत्र (KVP), आवर्ती जमा (RD), नियत निक्षेप (FD) आदि।
मूलपाठः श्लोकाः च (मूल पाठ एवं श्लोक) [पृष्ठ - ९, १०, ११, १२]
ब्राह्मे मुहूर्ते चोत्थाय धर्ममर्थं च चिन्तयेत् ॥ (गरुडपुराणम्)
सरलार्थ (हिन्दी): मनुष्य को प्रातकाल ब्रह्ममुहूर्त में उठकर धर्म और अर्थ (कर्तव्य एवं जीविका) का चिंतन करना चाहिए।
सर्वेषामेव शौचानामर्थशौचं परं स्मृतम् ।
योऽर्थे शुचिर्हि सः शुचिर्न मृद्वारिशुचिः शुचिः ॥ (मनुस्मृतिः)
सरलार्थ (हिन्दी): सभी प्रकार की पवित्रताओं में धन की पवित्रता (ईमानदारी) को ही सर्वश्रेष्ठ माना गया है। जो धन के मामले में पवित्र व ईमानदार है, वही वास्तव में पवित्र है; केवल मिट्टी और जल से शरीर धो लेने वाला पवित्र नहीं कहलाता।
जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः ।
स क्रमः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च ॥ (चाणक्यनीतिः)
सरalार्थ (हिन्दी): जल की एक-एक बूंद गिरने से धीरे-धीरे घड़ा भर जाता है। यही नियम सभी विद्याओं, धर्म तथा धन के संचय पर भी लागू होता है। छोटी-छोटी बचत ही कालान्तर में विशाल धनराशि बन जाती है।
क्षणशः कणशश्चैव विद्यामर्थं च साधयेत् ।
क्षणे नष्टे कुतो विद्या कणे नष्टे कुतो धनम् ॥
सरलार्थ (हिन्दी): एक-एक क्षण का उपयोग करके विद्या और एक-एक कण (अल्प धन) बचाकर धन का अर्जन करना चाहिए। क्षण नष्ट करने पर विद्या कहाँ और कण (बचत) नष्ट करने पर धन कहाँ?
विशेष टिप्पणी (सांस्कृतिक व व्यावहारिक ज्ञान) [पृष्ठ - ९, १०, ११, १६]
१. कौटिल्यः / चाणक्यः: मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चन्द्रगुप्त मौर्य के महामंत्री व तक्षशिला के आचार्य। इनके विश्वप्रसिद्ध ग्रन्थ 'अर्थशास्त्रम्' में राजनीति, अर्थव्यवस्था तथा नीतिशास्त्र का गहन प्रतिपादन है।
२. चतुर्वर्गः (पुरुषार्थ-चतुष्टयम्): भारतीय संस्कृति में मानव जीवन के चार पुरुषार्थ बताए गए हैं—धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष। इस पाठ में धर्म और अर्थ के संतुलन को सुख का मूल सिद्ध किया गया है।
३. चक्रवृद्ध्यंशः (Compound Interest): जब मूलधन के साथ-साथ अर्जित ब्याज पर भी ब्याज मिलता है, उसे चक्रवृद्धि ब्याज कहते हैं। यह दीर्घकालिक बचत को तीव्र गति से बढ़ाने वाला एक शक्तिशाली वित्तीय साधन है।
अभ्यासाद् जायते सिद्धिः (अभ्यास-कार्यम्) [पृष्ठ - १८, १९, २०, २१]
प्रश्ना १. एकपदेन उत्तरं लिखत (एक पद में उत्तर दीजिए) [पृष्ठ - १८]:
- (क) वास्तविकसुखस्य आधारः कः ? → धर्मः
- (ख) कस्य अभावात् स्वकर्तव्यपालनं कठिनं भवति ? → धनस्य (पर्याप्तधनस्य)
- (ग) स्वस्थः आर्थिकव्यवहारः कतिविधः भवति ? → त्रिविधः
- (घ) कीदृशः आर्थिकव्यवहारः कदापि न करणीयः ? → अनैतिकः
- (ङ) स्वावलम्बनं कस्य मूलं वर्तते ? → स्वाभिमानस्य
- (च) जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः किं पूर्यते ? → घटः
प्रश्ना २. पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखत (पूर्ण वाक्य में उत्तर दीजिए) [पृष्ठ - १८, १९]:
(क) "सुखस्य मूलं धर्मः, धर्मस्य मूलम् अर्थः" इतीदं प्रसिद्धं वाक्यं कस्मिन् ग्रन्थे प्राप्यते ?
उत्तरम्: "सुखस्य मूलं धर्मः, धर्मस्य मूलम् अर्थः" इतीदं प्रसिद्धं वाक्यं कौटिल्यस्य अर्थशास्त्रे प्राप्यते।
(ख) सामान्यजीवने कासाम् आवश्यकतानां पूर्त्यर्थं धनम् आवश्यकम् ?
उत्तरम्: सामान्यजीवने अन्नं, वस्त्रम्, आवासः, शिक्षा, स्वास्थ्यसेवा चेत्यादीनां मूलभूतानाम् आवश्यकतानां पूर्तये धनम् आवश्यकम्।
(ग) ब्राह्मे मुहूर्ते कयोः चिन्तनम् आवश्यकम् ?
उत्तरम्: ब्राह्मे मुहूर्ते धर्मस्य अर्थस्य च (धर्मार्थयोः) चिन्तनम् आवश्यकम्।
(घ) जनः केन स्वावलम्बी भवति ?
उत्तरम्: जनः सञ्चयस्य अभ्यासेन स्वावलम्बी भवति।
(ङ) लघुलघुसञ्चयः अपि कालान्तरे केन रूपेण वर्धते ?
उत्तरम्: लघुलघुसञ्चयः अपि कालान्तरे महत्सम्पत्तिरूपेण वर्धते।
प्रश्ना ३. वाक्येन सह ग्रन्थस्य सम्मेलनं कुरुत (उचित मिलान कीजिए) [पृष्ठ - १९]:
- (क) जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः। → ४. चाणक्यनीतिः
- (ख) ब्राह्मे मुहूर्ते चोत्थाय धर्ममर्थं च चिन्तयेत्। → १. गरुडपुराणम्
- (ग) सर्वेषामेव शौचानामर्थशौचं परं स्मृतम्। → २. मनुस्मृतिः
- (घ) सुखस्य मूलं धर्मः, धर्मस्य मूलम् अर्थः। → ३. अर्थशास्त्रम्
प्रश्ना ४. रेखाङ्कितपदमाधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत (प्रश्न निर्माण कीजिए) [पृष्ठ - १९]:
(क) सुखस्य मूलं धर्मः। → सुखस्य मूलं किम् / कः ?
(ख) दिनस्य आरम्भे धर्मार्थयोः चिन्तनम् आवश्यकम्। → कस्य आरम्भे धर्मार्थयोः चिन्तनम् आवश्यकम् ?
(ग) सन्मार्गेण एव धनार्जनं करणीयम्। → केन एव धनार्जनं करणीयम् ?
(घ) अनैतिकः आर्थिकव्यवहारः कदापि न करणीयः। → अनैतिकः कः कदापि न करणीयः ?
(ङ) संकटकाले स्वाभिमानिजनः अन्यजनस्य आर्थिकसहायतां नापेक्षते। → संकटकाले स्वाभिमानिजनः कस्य आर्थिकसहायतां नापेक्षते ?
प्रश्ना ६. अधोलिखितानां प्रश्नानां शुद्धं विकल्पं चिनुत (सही विकल्प चुनिए) [पृष्ठ - २०, २१]:
(क) "सुखस्य मूलं धर्मः, धर्मस्य मूलम् अर्थः" इत्यस्य मुख्य आशयः कः अस्ति ? → (३) धर्मस्य आधारः अर्थः, सुखस्य आधारः धर्मः।
(ख) गरुडपुराणे किम् उपदिष्टम् अस्ति ? → (२) प्रभाते धर्मार्थयोः चिन्तनं करणीयम्।
(ग) "सर्वेषामेव शौचानामर्थशौचं परं स्मृतम्" इत्यस्य तात्पर्यं किम् ? → (३) अर्थशौचं सर्वोपरि, अन्यविधशौचेभ्यः श्रेयः।
(घ) छात्रैः क्रियमाणः अपव्ययः कः ? → (३) आडम्बरयुक्तः प्रदर्शनात्मकः व्ययः।
(ङ) "जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः" इति वाक्यं कः अवदत् ? → (२) चाणक्यः।
व्याकरणिक घटकाः (व्याकरण सारणियाँ) [पृष्ठ - १३, १४, १५, १६, १९, २०]
१. कठिन शब्दार्थ सारणी (Vocabulary Table)
२. क्रियापद सारणी (Verbs Table)
३. अव्यय, उपसर्ग एवं प्रत्यय सारणी (Grammar Components Table)
४. पाणिनीय/पाठगत सन्धि सारणी (Sandhi Table)
अग्रिमः पाठः (अगला पाठ)
तृतीयः पाठः आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें →
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