मनःपूतं समाचरेत्
(NCERT शारदा - कक्षा ९ संस्कृत पाठ्यपुस्तक)
पाठ्य-परिचयः एवं प्रस्तावना-वार्तालापः (पाठ का परिचय व संवाद) [पृष्ठ - ६७, ६८]
आचार्या:
प्रियच्छात्राः ! वदन्तु, किमपि कार्यं करणीयम् अस्ति चेत् आदौ किम् आवश्यकम्? यदि मनः एव मलिनं स्यात्, उद्देश्यम् एव अनुचितं स्यात् तर्हि किमपि कार्यं सम्यक् कथं भवेत्? अत एव अस्माभिः सर्वाणि कार्याणि पवित्रेण मनसा करणीयानि। एतदेव शिक्षयति प्रस्तुतं पाठः 'मनःपूतं समाचरेत्' इति।
हिन्दी अनुवाद: प्रिय छात्रो! बताइए, यदि कोई कार्य करना हो तो सबसे पहले क्या आवश्यक है? यदि मन ही मलिन (अपवित्र) हो और उद्देश्य ही अनुचित हो, तो कोई कार्य सही कैसे हो सकता है? इसलिए हमें सभी कार्य पवित्र मन से करने चाहिए। यही बात यह प्रस्तुत पाठ 'मनःपूतं समाचरेत्' (पवित्र मन से आचरण करना चाहिए) सिखाता है।
छात्राः:
आचार्ये ! अस्मिन पाठे वि विविधेभ्यः ग्रन्थेभ्यः सुभाषितानि सङ्कलितानि दृश्यन्ते। आयान्तु, वयं सुभाषितानि पठामः जीवने च आचरामः।
हिन्दी अनुवाद: आचार्या जी! इस पाठ में विभिन्न ग्रंथों से सुभाषितानि (सुंदर विचार) संकलित दिखते हैं। आइए, हम सब इन सुभाषितों को पढ़ते हैं और जीवन में आचरण में लाते हैं।
मूलपाठः, अन्वयः, भावार्थः च (श्लोक एवं सरलार्थ) [पृष्ठ - ६९, ७०, ७३]
दृष्टिपूर्तं न्यसेत् पादं वस्त्रपूतं जलं पिबेत् ।
सत्यपूतां वदेत् वाचं मनःपूतं समाचरेत् ॥ १ ॥ (मनुस्मृतिः)
सरलार्थ (हिन्दी): आँख से भली-भाँति देखकर (पवित्र करके) पैर रखना चाहिए, कपड़े से छानकर (पवित्र करके) जल पीना चाहिए, सत्य से पवित्र करके वाणी बोलनी चाहिए और मन से पवित्र/शुद्ध करके (सद्विचारपूर्वक) आचरण करना चाहिए।
धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः ।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ॥ २ ॥ (मनुस्मृतिः)
सरलार्थ (हिन्दी): धैर्य, क्षमा, मन पर नियंत्रण (दम), चोरी न करना (अस्तेय), पवित्रता (शौच), इन्द्रियों को वश में रखना, बुद्धि, विद्या, सत्य और क्रोध न करना (अक्रोध)—ये दस धर्म के लक्षण हैं।
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥ ३ ॥ (श्रीमद्भगवद्गीता)
सरलार्थ (हिन्दी): श्रेष्ठ पुरुष जैसा-जैसा आचरण करता है, अन्य सामान्य लोग भी वैसा-वैसा ही आचरण करते हैं। वह जिसे प्रमाण (आदर्श) मान लेता है, संसार उसी का अनुसरण करता है।
अभ्यासेन क्रियाः सर्वाः अभ्यासात् सकलाः कलाः ।
अभ्यासाद् ध्यानमौनादि किम् अभ्यासस्य दुष्करम् ॥ ४ ॥ (सुभाषितरत्नभाण्डागारः)
सरलार्थ (हिन्दी): निरंतर अभ्यास से सभी क्रियाएँ और समस्त कलाएँ सिद्ध हो जाती हैं। अभ्यास से ध्यान और मौन भी सिद्ध होता है; अभ्यास के लिए कुछ भी कठिन (दुष्कर) नहीं है।
प्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचैः प्रारभ्य विघ्नविहता विरमन्ति मध्याः ।
विघ्नैः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमानाः प्रारभ्य चोत्तमजनाः न परित्यजन्ति ॥ ५ ॥ (नीतिशतकम्)
सरलार्थ (हिन्दी): अधम (निम्न) कोटि के लोग विघ्न के भय से कार्य शुरू ही नहीं करते; मध्यम लोग शुरू करके विघ्न आने पर बीच में छोड़ देते हैं; किंतु उत्तम लोग बार-बार विघ्नों के टकराने पर भी शुरू किए गए कार्य को बीच में नहीं छोड़ते।
उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः दैवेन देयमिति कापुरुषा वदन्ति ।
दैवं निहत्य कुरु पौरुषमात्मशक्त्या यत्ने कृते यदि न सिध्यति कोऽत्र दोषः ॥ ६ ॥ (पञ्चतन्त्रम्)
सरलार्थ (हिन्दी): परिश्रम करने वाले पुरुषसिंह (श्रेष्ठ मनुष्य) के पास लक्ष्मी (सम्पत्ति) स्वयं आती है। "भाग्य से मिलेगा"—ऐसा कायर पुरुष कहते हैं। भाग्य का भरोसा छोड़कर अपनी शक्ति से पुरुषार्थ करो, प्रयत्न करने पर भी यदि कार्य सिद्ध न हो तो उसमें आपका कोई दोष नहीं है।
पुराणमित्येव न साधु सर्वं न चापि काव्यं नवमित्यवद्यम् ।
सन्तः परीक्ष्यान्यतरद् भजन्ते मूढः परप्रत्ययनेयबुद्धिः ॥ ७ ॥ (मालविकाग्निमित्रम्)
सरलार्थ (हिन्दी): केवल पुराना होने से ही सब कुछ अच्छा नहीं होता और नया होने से ही कोई काव्य निन्दनीय नहीं होता। सज्जन लोग परीक्षा (परीक्षण) करके दोनों में से श्रेष्ठ को स्वीकार करते हैं, जबकि मूर्ख दूसरों की बुद्धि या बहकावे से चालित होता है।
सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः परमापदां पदम् ।
वृणते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धाः स्वयमेव सम्पदः ॥ ८ ॥ (किरातार्जुनीयम्)
सरलार्थ (हिन्दी): बिना सोचे-समझे अचानक कोई कार्य नहीं करना चाहिए, क्योंकि अज्ञान/अविवेक परम आपत्तियों का स्थान है। विचारपूर्वक कार्य करने वाले व्यक्ति का गुणों की लोभी सम्पदतियाँ (लक्ष्मी) स्वयं वरण/चयन करती हैं।
स्वाध्यायान्मा प्रमदः (भारतीय-ज्ञान-परम्परा सन्दर्भः) [पृष्ठ - ७८]
पाठगत प्रमुख सन्दर्भ-ग्रन्थाः तत्प्रणेतारश्च:
- मनुस्मृतिः: धर्मशास्त्रीयग्रन्थः (रचयिता - मनुः)
- श्रीमद्भगवद्गीता: महाभारतस्य भीष्मपर्वणः अंशः (रचयिता - महर्षिः व्यासः)
- नीतिशतकम्: नीतिसाहित्यम् (रचयिता - भर्तृहरिः)
- पंचतन्त्रम्: नीति-कथासाहित्यम् (रचयिता - विष्णुशर्मा)
- मालविकाग्निमित्रम्: नाटकम्/रूपकम् (रचयिता - महाकवि कालिदासः)
- किरातार्जुनीयम्: प्रसिद्धं महाकाव्यम् (रचयिता - महाकवि भारविः)
अभ्यासाद् जायते सिद्धिः (अभ्यास-कार्यम्) [पृष्ठ - ७४, ७५, ७६, ७७]
प्रश्ना १. पूर्णवाक्येन उत्तराणि लिखत (पूर्ण वाक्य में उत्तर दीजिए) [पृष्ठ - ७४]:
(क) लोकः कस्य आचरणम् अनुकरोति ?
उत्तरम्: लोकः श्रेष्ठस्य जनस्य आचरणम् अनुकरोति।
(ख) कीदृशी वाणी वक्तव्या ?
उत्तरम्: सत्यपूता वाणी वक्तव्या।
(ग) लक्ष्मीः कम् उपैति ?
उत्तरम्: लक्ष्मीः उद्योगिनं पुरुषसिंहम् उपैति।
(घ) उत्तमजनाः कार्यं प्रारभ्य किं न कुर्वन्ति ?
उत्तरम्: उत्तमजनाः कार्यं प्रारभ्य विघ्नैः प्रतिहन्यमानाः अपि न परित्यजन्ति।
(ङ) धर्मस्य लक्षणानि कानि ?
उत्तरम्: धृतिः, क्षमा, दमः, अस्तेयम्, शौचम्, इन्द्रियनिग्रहः, धीः, विद्या, सत्यम्, अक्रोधः च इति धर्मस्य दश लक्षणानि सन्ति।
(च) सम्पदः कं वृणते ?
उत्तरम्: सम्पदः विमृश्यकारिणं गुणलुब्धाः स्वयमेव वृणते।
प्रश्ना २. श्लोकांशानां रिक्तस्थानानि पूरयत (रिक्त स्थान भरिए) [पृष्ठ - ७४]:
(क) अविवेकः परमापदां पदम्।
(ख) सन्तः परीक्ष्यान्यतरद् भजन्ते।
(ग) दैवं निहत्य कुरु पौरुषम् आत्मशक्त्या।
(घ) स यत् प्रमाणं कुरुते।
(ङ) धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्।
प्रश्ना ३. रेखाङ्कितपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत (प्रश्न निर्माण कीजिए) [पृष्ठ - ७४]:
(क) नीचैः विघ्नभयेन कार्यं न प्रारभ्यते। → नीचैः केन कार्यं न प्रारभ्यते ?
(ख) सकलाः कलाः अभ्यासात् सिध्यन्ति। → सकलाः कलाः कस्मात् सिध्यन्ति ?
(ग) वस्त्रपूतं जलं पिबेत्। → कीदृशं जलं पिबेत् ?
(घ) लक्ष्मीः पुरुषसिंहम् उपैति। → का पुरुषसिंहम् उपैति ?
प्रश्ना ७. श्लोकांशैः सह स्रोतोग्रन्थस्य मेलनं कुरुत (ग्रंथों से मिलान कीजिए) [पृष्ठ - ७६]:
- (क) पुराणामित्येव न साधु सर्वम् → ४. मालविकाग्निमित्रम्
- (ख) प्रारभ्य चोत्तमजनाः न परित्यजन्ति → ३. नीतिशतकम्
- (ग) यद्यदाचरति श्रेष्ठः → ५. श्रीमद्भगवद्गीता
- (घ) धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयम् → १. मनुस्मृतिः
- (ङ) उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः → २. पञ्चतन्त्रम्
व्याकरणिक घटकाः (व्याकरण सारणियाँ) [पृष्ठ - ७०, ७१, ७२, ७६, ७७]
१. कठिन शब्दार्थ सारणी (Vocabulary Table) [पृष्ठ - ७०, ७१, ७२]
२. क्रियापद सारणी (Verbs Table) [पृष्ठ - ७०, ७१, ७२]
३. अव्यय, उपसर्ग एवं प्रत्यय सारणी (Grammar Components Table) [पृष्ठ - ७१, ७२]
४. पाणिनीय/पाठगत सन्धि सारणी (Sandhi Table) [पृष्ठ - ७६, ७७]
अग्रिमः पाठः (अगला पाठ)
सप्तमः पाठः - उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत् पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें →
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