उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत्
(NCERT शारदा - कक्षा ९ संस्कृत पाठ्यपुस्तक - पञ्चतन्त्रस्य कथा)
पाठ्य-परिचयः प्रस्तावना-संवादश्च (पाठ का परिचय एवं संवाद) [पृष्ठ - ७९]
पुत्रः:
मातः ! पश्यतु, अद्य अहं मार्गे पतितं धनम् प्राप्तवान्। एतेन धनेन बहूनि क्रीडनकानि क्रीणामि। मातः ! अन्यस्य धनं तृणम् इव कथं भवति?
हिन्दी अनुवाद: माताजी! देखिए, आज मुझे रास्ते में पड़ा हुआ धन मिला है। इस धन से मैं बहुत सारे खिलौने खरीदूँगा। माताजी! दूसरे का धन तिनके (तृण) के समान कैसे माना जाता है?
माता:
न हि पुत्र ! एतत् अन्यस्य श्रमार्जितं धनम् अस्ति, तस्मै एव प्रत्यर्पणीयम्। अन्यस्य धनं तृणम् इव गणनीयम्। एहि पुत्र ! अहं तुभ्यं पञ्चतन्त्रस्य काञ्चन कथां श्रावयामि यया त्वं स्वप्रश्नस्य उत्तरं प्राप्तुं शक्नोषि।
हिन्दी अनुवाद: नहीं पुत्र! यह किसी दूसरे व्यक्ति की मेहनत से कमाया हुआ धन है, उसे ही वापस लौटाना चाहिए। दूसरे के धन को तिनके के समान समझना चाहिए। आओ पुत्र! मैं तुम्हें पंचतंत्र की एक ऐसी कथा सुनाती हूँ जिससे तुम अपने प्रश्न का उत्तर पा सकोगे।
पाठस्य विस्तृत-व्याख्या (कथा-विस्तारः) [पृष्ठ - ८०, ८१, ८२, ८३, ८४]
- १. देशान्तरगमनं धनोपार्जनं च (विदेश यात्रा व धन अर्जन): किसी नगर में 'धर्मबुद्धिः' और 'पापबुद्धिः' नामक दो मित्र रहते थे। कुटिल पापबुद्धि ने सोचा कि वह दरिद्र है, अतः धर्मबुद्धि के साथ विदेश जाकर उसके सहारे धन कमाएगा और बाद में उसे ठग लेगा। गुरुजनों की आज्ञा लेकर दोनों विदेश गए और धर्मबुद्धि के प्रभाव व पुण्य से उन्होंने प्रचुर धन कमाया।
- २. धननिधानं छलं च (धन को छिपाना और छल): अपने नगर के समीप पहुँचकर पापबुद्धि ने धर्मबुद्धि से कहा कि सारा धन घर ले जाना उचित नहीं है, अतः इसे जंगल में एक पेड़ के नीचे गड्ढा खोदकर गाड़ देते हैं और केवल थोड़ा धन घर ले चलते हैं। धर्मबुद्धि ने उसकी बात मान ली। परन्तु आधी रात में पापबुद्धि ने अकेले जंगल जाकर सारा धन चुरा लिया और गड्ढा भर दिया।
- ३. मिथ्याभियोगः वनदेवतायाः साक्ष्यं च (झूठा आरोप व वनदेवता का साक्ष्य): कुछ दिनों बाद पापबुद्धि धर्मबुद्धि को साथ लेकर पुनः जंगल गया और गड्ढा खाली देखकर स्वयं सिर पीट-पीटकर रोने लगा तथा धर्मबुद्धि पर ही चोरी का झूठा आरोप लगा दिया। मामला धर्माधिकारी के पास गया। कोई गवाह न होने पर पापबुद्धि ने वनदेवता की साक्षी का प्रस्ताव रखा। वह रात में ही अपने पिता को शमी वृक्ष के विशाल कोटर (खोखल) में छिपा आया और उनसे वनदेवता बनकर झूठी गवाही देने को कहा।
- ४. उपायः अपायश्च सत्याुद्घाटनम् (उपाय, अपाय और सत्य का प्रकटीकरण): अगले दिन शमी वृक्ष के कोटर से आवाज आई कि "धर्मबुद्धि चोर है।" सभी लोग आश्चर्यचकित हो गए, किंतु बुद्धिमान् धर्मबुद्धि समझ गया कि यह कोई षड्यंत्र है। उसने तुरंत शमी वृक्ष के कोटर को सूखी लकड़ियों व ज्वलनशील पदार्थों से घेरकर आग लगा दी। आग की लपटों से जलता हुआ पापबुद्धि का पिता चीखता हुआ बाहर निकला और उसने मृत्यु से पूर्व पापबुद्धि की सारी करतूत खोल दी। पापबुद्धि को राजपुरुषों द्वारा दंडित किया गया और धर्मबुद्धि की बुद्धिमत्ता की प्रशंसा हुई।
मातृवत् परदारेषु परद्रव्येषु लोष्ठवत् ।
आत्मवत् सर्वभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः ॥ [पृष्ठ - ८२]
सरलार्थ (हिन्दी): जो व्यक्ति दूसरों की स्त्रियों को माता के समान, दूसरों के धन को मिट्टी के ढेले (लोष्ठ) के समान और संपूर्ण प्राणियों को अपने समान देखता व समझता है, वही वास्तव में धर्मबुद्धि और विद्वान है।
उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत् ।
पश्यतो बकमूर्खस्य नक्रैः भक्षिताः प्रजाः ॥ [पृष्ठ - ७९, ८४]
सरलार्थ (हिन्दी): बुद्धिमान् मनुष्य को केवल कार्य सिद्ध करने का उपाय ही नहीं सोचना चाहिए, अपितु उससे उत्पन्न होने वाले संकट (अपाय/दुष्परिणाम) का भी पूर्व चिंतन कर लेना चाहिए। केवल उपाय सोचने वाले मूर्ख की योजना से हानि ही होती है, जैसे केवल उपाय सोचने वाले बगुले के देखते ही देखते केकड़े/मगरमच्छ द्वारा उसकी संतानों का विनाश कर दिया गया।
स्वाध्यायान्मा प्रमदः (पञ्चतन्त्रम्, नित्यबहुवचनान्ताः व्याकरणम् च) [पृष्ठ - ८६, ९०, ९१]
१. पञ्चतन्त्र-परिचयः [पृष्ठ - ९०]: पञ्चतन्त्रम् पंडित विष्णुशर्मा द्वारा रचित नीति-कथा साहित्य का कालजयी ग्रंथ है। इसमें ५ तंत्र (भाग) हैं: (१) मित्रभेदः (२) मित्रसंप्राप्तिः (३) काकोलूकीयम् (४) लब्धप्रणाशः (५) अपरीक्षितकारकम्। प्रस्तुत कथा 'मित्रभेदः' तंत्र से ली गई है।
२. नित्यबहुवचनान्त-शब्दाः [पृष्ठ - ८६]: संस्कृत में कुछ शब्द सदैव बहुवचन में ही प्रयुक्त होते हैं। जैसे: आपः (जल), दाराः (पत्नी), प्राणाः/असवः (प्राण), सिकताः (बालू), लाजाः (कील/खील), अक्षतानि (अक्षत), वर्षाः (वर्षा का मौसम)।
३. तत्पुरुषसमासः क्तवतु-प्रत्ययश्च [पृष्ठ - ९०, ९१]:
• तत्पुरुष समास: जहाँ उत्तरपद प्रधान होता है और पूर्वपद की विभक्ति का लोप होता है (उदा. अर्थस्य उपार्जनम् = अर्थोपार्जनम्, देशस्य भक्तः = देशभक्तः)।
• क्तवतु प्रत्यय (भूतकाल): जैसे पठ् + क्तवतु = पठितवान् (पुं) / पठितवती (स्त्री) / पठितवत् (नपुं)।
अभ्यासाद् जायते सिद्धिः (अभ्यास-कार्यम्) [पृष्ठ - ८७, ८८, ८९]
प्रश्ना १. पूर्णवाक्येन उत्तराणि लिखत (पूर्ण वाक्य में उत्तर दीजिए) [पृष्ठ - ८७]:
(क) नरस्य वृत्तं के जानन्ति ?
उत्तरम्: आदित्यः, चन्द्रः, अनिलः, अनलः, द्यौः, भूमिः, आपः, हृदयं, यमः, अहः, रात्रिः, उभे सन्ध्ये, धर्मः च नरस्य वृत्तं जानन्ति।
(ख) धर्मबुद्धयः किं वीक्षन्ते ?
उत्तरम्: धर्मबुद्धयः परदारेषु मातृवत्, परद्रव्येषु लोष्ठवत्, सर्वभूतेषु च आत्मवत् वीक्षन्ते।
(ग) कस्य जन्मनः फलं व्यर्थम् ?
उत्तरम्: येन धरणीपीठे भ्रमता बहुविधभाषावेषादिकं न ज्ञातम्, तस्य जन्मनः फलं व्यर्थम्।
(घ) प्राज्ञः किं-किं चिन्तयेत् ?
उत्तरम्: प्राज्ञः उपायं चिन्तयेत् तथा अपायं च चिन्तयेत्।
(ङ) पापबुद्धिः स्वपितरं किम् उक्तवान् ?
उत्तरम्: पापबुद्धिः स्वपितरम् उक्तवान् यत् भवान् शमीकोटरं प्रविश्य मया पृष्टे धर्मबुद्धिः चोरः इति वदतु इति।
प्रश्ना ३. कः कं प्रति कथयति इति लिखत (किसने किससे कहा) [पृष्ठ - ८८]:
(क) वत्स ! द्रुतं वद येन तद्द्रव्यं स्थिरं तिष्ठेत्। → पिता (पापबुद्धिं प्रति)
(ख) प्रातःकाले युवाम अस्माभिः सह तत्र वनप्रदेशं गच्छतम्। → धर्माधिकारी (धर्मबुद्धिं पापबुद्धिं च प्रति)
(ग) त्वया हृतम् एतद्धनम्, नान्येन। → पापबुद्धिः (धर्मबुद्धिं प्रति)
(घ) भोः दुरात्मन् ! मा ममैवं वद। → धर्मबुद्धिः (पापबुद्धिं प्रति)
(ङ) एतत् सर्वमपि पापबुद्धेः चेष्टितम्। → पापबुद्धेः पिता (जनान्/धर्माधिकारिणं प्रति)
प्रश्ना ७. कथाक्रमानुसारं पुनर्लेखनम् (कथा का सही क्रम) [पृष्ठ - ८९, ९०]:
- कस्मिंश्चिद् देशे धर्मबुद्धिः पापबुद्धिश्च द्वे मित्रे प्रतिवसतः स्म।
- ततस्तौ गुरुजनानाम् अनुमतिं प्राप्य शुभेऽहनि देशान्तरं प्रस्थितौ।
- यथा द्वाभ्यां चिन्तितं तथैव भूमिं खनित्वा तत्रैव धनं निक्षिप्य स्वगृहं गतवन्तौ।
- द्वावपि गत्वा तत्स्थानं यावत् खनतः तावत् रिक्तं भाण्डं दृष्टवन्तौ।
- भवान् यदि मदुक्तप्रकारेण वदति तर्हि तद्धनं मयि स्थिरं तिष्ठति।
- राजपुरुषाः पापबुद्धिं दण्डितवन्तः।
व्याकरणिक घटकाः (व्याकरण सारणियाँ) [पृष्ठ - ८४, ८५, ८६, ९०, ९१]
१. कठिन शब्दार्थ सारणी (Vocabulary Table) [पृष्ठ - ८४, ८५, ८६]
२. क्रियापद सारणी (Verbs Table - निष्ठा क्तवतु रूप सह) [पृष्ठ - ८५, ९०, ९१]
३. अव्यय, उपसर्ग एवं प्रत्यय सारणी (Grammar Components Table) [पृष्ठ - ८५, ९०, ९१]
४. पाणिनीय/पाठगत सन्धि सारणी (Sandhi Table)
अग्रिमः पाठः (अगला पाठ)
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