महामृत्युञ्जय मन्त्र

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कक्षा-9 | पाठ-08

अष्टमः पाठः

अन्नाद् आनन्दं प्रति

(NCERT शारदा - कक्षा ९ संस्कृत पाठ्यपुस्तक - तैत्तिरीयोपनिषदः)

पाठ्य-परिचयः (पाठ का परिचय) [पृष्ठ - ९२]

संस्कृतवाङ्मये उपनिषत्-साहित्यस्य विशिष्टं महत्त्वपूर्णं च स्थानम् अस्ति। उपनिषत्सु अनेके ज्ञानप्रदाः संवादाः सन्ति। तैत्तिरीयोपनिषदि समग्रजीवनविकासाय पञ्चकोषाणां (अन्नमय-प्राणमय-मनोमय-विज्ञानमय-आनन्दमयकोषाणाम्) महत्त्वं पितापुत्रसंवादरूपेण वर्णितम्। तादृशज्ञानप्रदसंवादानाम् अध्ययनेन बोधनेन च वयम् आत्मविकासं कर्तुं शक्नुमः। अस्मिन् पाठे वयं पितापुत्रयोः भृगुवरुणयोः संवादं पठिष्यामः।

हिन्दी अनुवाद: संस्कृत साहित्य में उपनिषद् साहित्य का विशेष एवं महत्त्वपूर्ण स्थान है। उपनिषदों में अनेक ज्ञानवर्धक संवाद हैं। तैत्तिरीय उपनिषद् में संपूर्ण जीवन के विकास के लिए पाँचों कोषों का महत्त्व पिता-पुत्र के संवाद रूप में वर्णित है। इस पाठ में हम पिता और पुत्र (वरुण एवं भृगु) के मध्य ब्रह्म ज्ञान विषयक संवाद को पढ़ेंगे।

भृगु-वरुण-संवादः (पंचकोष-विकासः) [पृष्ठ - ९२ - ९७]

भृगुः (पितरं प्रति):

अयि भोः पितः ! अभिवादयेऽहं सादरम्। भगवन् ! ब्रह्मविषये मयि काचिद् जिज्ञासा वर्तते। किं तद् ब्रह्म येन सर्वं जगदिदं सञ्चाल्यते ? कृपया उपदिशतु।

हिन्दी: हे पिता जी! मैं सादर प्रणाम करता हूँ। हे भगवन्! मेरे मन में ब्रह्म के विषय में जिज्ञासा है। वह ब्रह्म क्या है जिससे यह संपूर्ण जगत् संचालित होता है? कृपया उपदेश दीजिए।

वरुणः (पितोपदेशः):

पुत्र ! शुभं भूयात्। ब्रह्मज्ञानाय त्वया स्वयमेव अन्वेषणं क्रियताम्। यत्नः अभ्यासश्च क्रियेताम्। तपस्तप्यताम्। तपसैव ज्ञायते।

हिन्दी: पुत्र! तुम्हारा कल्याण हो। ब्रह्म ज्ञान के लिए तुम्हें स्वयं ही अन्वेषण (खोज) करना चाहिए। प्रयत्न और अभ्यास करो। तपस्या करो, तपस्या से ही ज्ञान होता है।

भृगुः (तपसः अनन्तरं क्रमिक-अनुभूतिः):

१. अन्नं वै ब्रह्म: अन्नाद् एव प्राणिनः जायन्ते, अन्नेन जीवन्ति, अन्नेन शरीरं बलं च वर्धेते।
२. प्राणो वै ब्रह्म: प्राणाद् एव इमानि भूतानि जायन्ते, प्राणेन जातानि जीवन्ति। प्राणे शरीरं प्रतिष्ठितम्।
३. मनो वै ब्रह्म: मन एव सर्वकर्मणः प्रवर्तकम्। मनसा एव सर्वाणि इन्द्रियाणि सञ्चाल्यन्ते।
४. विज्ञानं वै ब्रह्म: बुद्धितत्त्वमेव विज्ञानम्। बुद्ध्या एव बोध-तर्क-विवेक-निर्णयशक्तीनां विकासः भवति।
५. आनन्दो वै ब्रह्म: सर्वकर्माणि आनन्दाय भवन्ति। आनन्दे एव प्राणिनः जीवन्ति।

हिन्दी: १. अन्न ही ब्रह्म है (अन्नमय कोष)। २. प्राण ही ब्रह्म है (प्राणमय कोष)। ३. मन ही ब्रह्म है (मनोमय कोष)। ४. विज्ञान/बुद्धि ही ब्रह्म है (विज्ञानमय कोष)। ५. आनन्द ही ब्रह्म है (आनन्दमय कोष)।

वरुणः (अंतिम निष्कर्षः):

हे पुत्र ! त्वं तपसा सूक्ष्मविज्ञानेन च अन्नस्य, प्राणस्य, मनसः, विज्ञानस्य, आनन्दस्य च महत्त्वं ज्ञातवान्। एतैः पञ्चभिः एव अस्माकं पूर्णविकासः भवति। एतानि ब्रह्मज्ञानाय द्वाराणि सन्ति।

हिन्दी: हे पुत्र! तुमने तपस्या और सूक्ष्म विज्ञान से अन्न, प्राण, मन, विज्ञान तथा आनन्द का महत्त्व जान लिया। इन पाँचों द्वारा ही हमारा पूर्ण विकास होता है। ये ब्रह्मज्ञान के द्वार हैं।

अन्नाद् भवन्ति भूतानि पर्जन्याद् अन्नसम्भवः ।
यज्ञाद् भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः ॥ [अन्नसूक्त/गीता]

सरलार्थ (हिन्दी): सभी प्राणी अन्न से उत्पन्न एवं जीवित रहते हैं, अन्न की उत्पत्ति वर्षा से होती है, वर्षा यज्ञ से होती है और यज्ञ शुभ कर्मों से संपन्न होता है। अतः अन्न सर्वऔषध एवं पूज्य है।

यावद् वायुः स्थितो देहे तावज्जीवनमुच्यते ।
मरणं तस्य निष्क्रान्तिस्ततो वायुं निरोधयेत् ॥ [हठयोगप्रदीपिका]

सरलार्थ (हिन्दी): जब तक शरीर में प्राणवायु स्थित रहती है, तब तक ही जीवन कहलाता है। प्राणवायु का बाहर निकल जाना ही मृत्यु है; इसलिए प्राणायाम द्वारा प्राणवायु को नियंत्रित व सुरक्षित रखना चाहिए।

आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः ।
स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षः ॥ [छान्दोग्योपनिषद्]

सरलार्थ (हिन्दी): आहार (भोजन) के शुद्ध होने पर अन्तःकरण (चित्त) की शुद्धि होती है, अन्तःकरण शुद्ध होने पर बुद्धि व स्मृति निश्चल होती है, और निश्चल स्मृति/आत्मज्ञान प्राप्त होने से हृदय की सभी गाँठें (संशय/अज्ञान) नष्ट हो जाती हैं।

स्वाध्यायान्मा प्रमदः (पञ्चकोष-सोपानम् एवं उपनिषद्-रहस्यम्) [पृष्ठ - १००, १०९, ११०]

१. पञ्चकोषाः (समग्र जीवन विकास): भारतीय दर्शन के अनुसार मानव व्यक्तित्व के ५ स्तर हैं[cite: 10]:
• अन्नमयकोषः: स्थूल शरीर, जो अन्न से निर्मित व पुष्ट होता है[cite: 10]।
• प्राणमयकोषः: प्राणवायु एवं प्राणायाम द्वारा जीवन शक्ति का नियमन[cite: 10]।
• मनोमयकोषः: मन, संकल्प, विकल्प एवं मानसिक वृत्तियों का नियमन[cite: 10]।
• विज्ञानमयकोषः: बुद्धि, विवेक, तर्क एवं निर्णय क्षमता[cite: 10]।
• आनन्दमयकोषः: परम सुख, शांति एवं ब्रह्म अनुभूति[cite: 10]।

२. मनसः द्विविधं रूपम् [पृष्ठ - ११०]:
"मनो हि द्विविधं प्रोक्तं शुद्धं चाशुद्धमेव च। अशुद्धं कामसंकल्पं शुद्धं कामविवर्जितम्॥" (अमृतबिन्दूपनिषद्)
अर्थात् मन दो प्रकार का है— शुद्ध और अशुद्ध[cite: 10]। इच्छाओं/कामनाओं से घिरा मन अशुद्ध है और निष्काम व पवित्र मन ही मुक्ति का साधन है[cite: 10]।

अभ्यासाद् जायते सिद्धिः (अभ्यास-कार्यम्) [पृष्ठ - १०१ - १०४]

प्रश्ना १. एकेन पदेन रिक्तस्थानं पूरयत (एक पद द्वारा रिक्त स्थान भरिए) [पृष्ठ - १०१]:

(क) अन्नेन शरीरं वर्धते।[cite: 10]

(ख) प्राणे शरीरं प्रतिष्ठितम्।[cite: 10]

(ग) प्राणेन विना शरीरं क्रियाशून्यं भवति।[cite: 10]

(घ) प्राणात् एव इमानि भूतानि जायन्ते।[cite: 10]

(ङ) मनसा समस्तानि इन्द्रियाणि सञ्चाल्यन्ते।[cite: 10]

(च) विज्ञानेन / बुद्ध्या विना बोधशक्तेः तर्कशक्तेश्च विकासो न भवति।[cite: 10]

(छ) मनः एव सर्वकर्मणः प्रवर्तकम्।[cite: 10]

प्रश्ना २. पूर्णवाक्येन उत्तराणि लिखत (पूर्ण वाक्य में उत्तर दीजिए) [पृष्ठ - १०१]:

(क) भृगोः जिज्ञासा कस्मिन् विषये आसीत् ?[cite: 10]

उत्तरम्: भृगोः जिज्ञासा ब्रह्मविषये आसीत्।[cite: 10]

(ख) भृगुणा ब्रह्मज्ञानाय किम् आचरितम् ?[cite: 10]

उत्तरम्: भृगुणा ब्रह्मज्ञानाय यत्नः, अभ्यासः, कठोरं तपः च आचरितम्।[cite: 10]

(ग) भृगुः प्रथमं तपसा ब्रह्मरूपेण किं ज्ञातवान् ?[cite: 10]

उत्तरम्: भृगुः प्रथमं तपसा 'अन्नं वै ब्रह्म' इति ज्ञातवान्।[cite: 10]

(घ) इन्द्रियाणि केन सञ्चाल्यन्ते ?[cite: 10]

उत्तरम्: समस्तानि इन्द्रियाणि मनसा सञ्चाल्यन्ते।[cite: 10]

(ङ) भृगुः तपसा केषां महत्त्वं ज्ञातवान् ?[cite: 10]

उत्तरम्: भृगुः तपसा अन्नस्य, प्राणस्य, मनसः, विज्ञानस्य, आनन्दस्य च महत्त्वं ज्ञातवान्।[cite: 10]

प्रश्ना ३. सत्यम् अथवा असत्यम् इति लिखत [पृष्ठ - १०२]:

(क) प्रस्तुत पाठे पितापुत्रयोः संवादः अस्ति।  →  सत्यम्[cite: 10]

(ख) अस्मिन् संवादे अन्नस्य महत्त्वं वर्णितम्।  →  सत्यम्[cite: 10]

(ग) प्राणीनः मनसः जायन्ते इति कथनम् अस्ति।  →  असतम् (अन्नात् जायन्ते)[cite: 10]

(घ) भृगुः वरुणस्य पुत्रः अस्ति।  →  सत्यम्[cite: 10]

(ङ) भृगुः तपसा मनो ब्रह्मरूपेण ज्ञातवान्।  →  सत्यम्[cite: 10]

प्रश्ना ४. क्रियापदेन सह समुचितं पदं योजयत (उचित मिलान कीजिए) [पृष्ठ - १०२]:

  • (क) प्राणिनः  →  ३. जायन्ते[cite: 10]
  • (ख) शरीरम्  →  ४. वर्धते[cite: 10]
  • (ग) तपः  →  २. कुरुताम्[cite: 10]
  • (घ) पितरम्  →  ५. ब्रूते[cite: 10]
  • (ङ) यत्नः  →  १. क्रियताम्[cite: 10]

व्याकरणिक घटकाः (व्याकरण सारणियाँ) [पृष्ठ - ९८ - १०५]

१. कठिन शब्दार्थ सारणी (Vocabulary Table) [पृष्ठ - ९८, ९९, १००]

क्र.सं. कठिन शब्द संस्कृत व्याख्या हिंदी अर्थ English Meaning
१ अन्वेष्टव्यम् अनु + √इष् + तव्यत् खोज करनी चाहिए To be explored
२ अवबद्धम् अव + √बुध् + क्त जाना / समझा गया Understood
३ निष्क्रान्तिः निस् + √क्रम् + क्तिन् बाहर निकलना / मृत्यु Going out / Death
४ परिहर्तव्यम् परि + √हृ + तव्यत् त्याग करना चाहिए Should be discarded
५ विचिकित्सा सन्देहः / संशयः संदेह / शंका Doubt
६ विप्रमोक्षः वि + प्र + मोक्षः अत्यंत मुक्ति / ग्रंथि-नाश Final Liberation

२. क्रियापद सारणी (Verbs Table - आत्मनेपदि लोट्-लकार सह) [पृष्ठ - १०३, १०८]

क्र.सं. क्रियापद / रूप मूल धातु लकार-पुरुष-वचन हिंदी अर्थ
१ सेवताम् / सेवेत् सेव् (आत्मनेपदम्) लोट् / विधिलिङ्, प्रथम पुरुष, एकवचन सेवन करना चाहिए
२ कुरुताम् / क्रियताम् कृ (करोति/कुरुते) लोट् लकार (कर्तरि/कर्मणि), १-पुरुष, एकवचन करे / किया जाए
३ विवर्धन्ते / सम्भवन्ति वि + वृध् / सम् + भू लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन बढ़ते हैं / उत्पन्न होते हैं
४ निरोधयेत् नि + रुध् (णिच्) विधिलिङ् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन रोकना/नियंत्रित करना चाहिए

३. अव्यय, उपसर्ग एवं प्रत्यय सारणी (Grammar Components Table) [पृष्ठ - १०६, १०७]

क्र.सं. पद / शब्द प्रकार (अव्यय/उपसर्ग/प्रत्यय) संरचना / विवरण अर्थ
१ कर्तव्यम् / करणीयम् कृदन्त प्रत्यय पदम् √कृ + तव्यत् / √कृ + अनियर् करने योग्य / करना चाहिए
२ पठितव्यः / पठनीयः कृदन्त प्रत्यय पदम् √पठ् + तव्यत् / √पठ् + अनियर् पढ़ने योग्य / पढ़ना चाहिए
३ तपस्तप्त्वा प्रत्ययान्त पदम् √तप् + क्त्वा तपस्या करके
४ यावत्... तावत्... अव्यय-युगलम् सम्बद्ध अव्यय पदम् जब तक... तब तक...

४. पाणिनीय/पाठगत सन्धि सारणी (Sandhi Table)

क्र.सं. सन्धि पद विच्छेदः सन्धेः नाम
१ अन्नाद्भवन्ति अन्नात् + भवन्ति जश्त्व व्यञ्जनसन्धिः (दकारः)
२ अन्नोऽहम् / अतोऽन्नम् अन्नः + अहम् / अतः + अन्नम् उत्त्व विसर्गसन्धिः / पूर्वरूपम्
३ आनन्दो वै आनन्दः + वै उत्त्व विसर्गसन्धिः (ओकारः)
४ अनुकृहीतोऽस्मि अनुगृहीतः + अस्मि उत्त्व विसर्गसन्धिः

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