वर्णोच्चारण-शिक्षा २
(आभ्यन्तर-प्रयत्न-प्रकरणम् एवं पाणिनीय-शिक्षा-सूत्राणि)
१. पाठ-परिचयः (पृष्ठभूमिः) [पृष्ठ - १४५]
पूर्व पाठ में हमने देखा कि मनुष्य में वाग्-उत्पत्ति की प्रक्रिया में मुख (आस्य) के भीतर वर्णोच्चारण के लिए तीन प्रमुख तत्त्व अनिवार्य होते हैं:
- (क) स्थानम् (६ स्थानानि — कण्ठ, तालु, मूर्धा, दन्ताः, ओष्ठौ, नासिका)
- (ख) करणम् (६ करणानि — जिह्वाग्र, जिह्वामध्य, जिह्वामूल/उपाग्र, ओष्ठ, नासिका, स्वस्थान)
- (ग) आभ्यन्तर-प्रयत्नः (आस्य के भीतर का आन्तरिक यत्न)
प्रस्तुत पाठ में हम (ग) आभ्यन्तर-प्रयत्न के पाँचों भेदों और उनके नियमों का विस्तारपूर्वक अध्ययन करेंगे।
२. आभ्यन्तर-प्रयत्नः स्वरूपं भेदाः च [पृष्ठ - १४६-१४८]
(१) स्पृष्ट-प्रयत्नः (Touched) [पृष्ठ - १४६]
संस्कृत व्याख्या: करणं यदा स्थानं 'स्पष्ट-रूपेण स्पृशति', तदा करणस्य 'स्पृष्ट-प्रयत्नः' भवति। अनेन स्थाने स्पर्श-व्यञ्जनानि (क-वर्ग से म-वर्ग पर्यन्तम् = २५ वर्णाः) उत्पद्यन्ते।
हिन्दी अर्थ: जब उच्चारण करण स्थान को पूरी तरह स्पर्श करता है, तब 'स्पृष्ट प्रयत्न' होता है। इससे २५ स्पर्श वर्ण उत्पन्न होते हैं।
(२) ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्नः (Slightly Touched) [पृष्ठ - १४६]
संस्कृत व्याख्या: करणं यदा स्थानं 'स्वल्पम् एव स्पृशति', तदा करणस्य 'ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्नः' भवति। अनेन अन्तःस्थ-व्यञ्जनानि (य, र, ल, व = ४ वर्णाः) जायन्ते।
हिन्दी अर्थ: जब करण उच्चारण स्थान को बहुत थोड़ा छूता है, तब 'ईषत्-स्पृष्ट' यत्न होता है। इससे अन्तःस्थ (अर्ध-स्वर) बनते हैं।
(३) ईषद्-विवृत-प्रयत्नः (Slightly Opened) [पृष्ठ - १४७]
संस्कृत व्याख्या: करणं यदा स्थानं न स्पृशति, परन्तु स्थानस्य बहु समीपं याति, तदा उभयोः मध्ये 'लघुः विवरः' (अन्तरालः) जायते। अनेन ऊष्म-व्यञ्जनानि (श, ष, स, ह = ४) तथा अयोगवाहौ (अनुस्वारः अं, विसर्गः अः = २) जायन्ते।
हिन्दी अर्थ: जब करण स्थान को छूता नहीं बल्कि अत्यंत पास जाकर एक संकरा मार्ग (छोटा छिद्र) छोड़ता है, तब ऊष्म और अयोगवाह वर्ण उच्चारित होते हैं।
(४) विवृत-प्रयत्नः (Opened) [पृष्ठ - १४७]
संस्कृत व्याख्या: करणं यदा स्थानं न स्पृशति, अपि तु स्थानस्य किञ्चित् समीपं याति, तदा उभयोः मध्ये 'स्फुटः विवरः' (विस्तृतः अन्तरालः) जायते। अनेन (ह्रस्व 'अ' कारं विहाय) सर्वे स्वराः (२१ स्वराः) उच्चार्यन्ते।
हिन्दी अर्थ: मुख पूरा खुला रहता है और करण-स्थान में स्पष्ट दूरी होती है। ह्रस्व 'अ' को छोड़कर सभी स्वर (आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ॠ, ऌ, ए, ऐ, ओ, औ आदि) विवृत प्रयत्न से बोले जाते हैं।
(५) संवृत-प्रयत्नः (Contracted / Closed) [पृष्ठ - १४८]
संस्कृत व्याख्या: केवलम् ह्रस्वस्य 'अ-कारस्य' प्रयोगे कण्ठे स्थान-करणयोः मध्ये 'संकोचः' (कण्ठः संकुचितः संकीर्णः वा) भवति। कण्ठस्य अयं संकोचः 'संवृतम्' कथ्यते। अतः ह्रस्वाकारस्य उच्चारणे 'संवृत-प्रयत्नः' भवति।
हिन्दी अर्थ: केवल ह्रस्व 'अ' के उच्चारण में कंठ संकुचित (सिकुड़ा हुआ) रहता है, जिसे संवृत प्रयत्न कहा जाता है।
३. पाणिनीय-शिक्षा-सूत्राणि [पृष्ठ - १५८]
सरलार्थ: वर्णोच्चारण के लिए प्रयत्न दो प्रकार का होता है — आभ्यन्तर और बाह्य।
सरलार्थ: वर्ण के अपने स्थान के प्रति करण का जो आन्तरिक व्यापार होता है, वह आभ्यन्तर प्रयत्न है।
सरलार्थ: स्पर्श वर्णों (क से म) का आभ्यन्तर प्रयत्न 'स्पृष्ट' होता है।
सरलार्थ: अन्तःस्थ वर्णों (य, र, ल, व) का आभ्यन्तर प्रयत्न 'ईषत्-स्पृष्ट' होता है।
सरलार्थ: ऊष्म वर्णों (श, ष, स, ह) तथा अयोगवाहों का प्रयत्न 'ईषद्-विवृत' होता है।
सरलार्थ: स्वरों का उच्चारण आभ्यन्तर प्रयत्न 'विवृत' होता है।
सरलार्थ: प्रयोग अवस्था में ह्रस्व 'अ' वर्ण का प्रयत्न 'संवृत' होता है।
सरलार्थ: इस प्रकार यह आभ्यन्तर प्रयत्न का पूर्ण विवरण है।
💡 विशेष टिप्पणी: वेणु-वादन-सादृश्यम् (बांसुरी और मुख का व्यावहारिक दृष्टान्त) [पृष्ठ - १४९]
पाठ में मुख के अवयवों की तुलना बांसुरी (वेणुः) के वादन से की गई है:
- अंगुलियाँ (अङ्गुलयः) = करण (Tools) के समान हैं।
- बांसुरी के छिद्र (अङ्गुलिच्छिद्राणि) = स्थान (Places) के समान हैं।
- अंगुली का छिद्र के प्रति संचालन = आभ्यन्तर-प्रयत्न (Internal Effort) के समान है।
स्वर व व्यञ्जन भेद: स्वर स्वतंत्र होते हैं (एकमात्रिक/द्विमात्रिक/त्रिमात्रिक), जबकि व्यञ्जन परतंत्र और नित्य अर्धमात्रिक होते हैं।
४. अभ्यास-कार्यम् (प्रश्नोत्तराणि) [पृष्ठ - १५९-१६०]
अभ्यासः १ — एकपदेन उत्तरत [पृष्ठ - १५९]
अभ्यासः २ — पूर्णवाक्येन उत्तरत [पृष्ठ - १५९]
उत्तरम्: आस्यस्य अभ्यन्तरे करणं येन प्रयत्नेन स्थानं स्पृशति, स्थानस्य समीपं वा याति, सः प्रयत्नः 'आभ्यन्तर-प्रयत्नः' इति उच्यते।
उत्तरम्: करणं यदा स्थानं 'स्वल्पम् एव स्पृशति', तदा करणस्य 'ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्नः' भवति।
उत्तरम्: करणस्य विवृत-प्रयत्नेन ह्रस्वम् अ-कारं विहाय अन्ये सर्वे स्वराः उच्चार्यन्ते।
उत्तरम्: कण्ठ्य-तालव्य-मूर्धन्य-दन्त्य-ओष्ठ्येषु पञ्च-प्रकारेषु वर्णेषु स्थान-करणयोः मध्ये आभ्यन्तर-प्रयत्नाः दृश्यन्ते।
उत्तरम्: आभ्यन्तर-प्रयत्ने स्वरेषु ह्रस्वः 'अ-कारः' विशिष्टः स्वरः अस्ति (यस्य संवृतप्रयत्नः भवति)।
अभ्यासः ३ — क-स्तम्भेन सह ख-स्तम्भस्य मेलनं कुरुत [पृष्ठ - १५९]
| क-स्तम्भः (प्रयत्नः) | ख-स्तम्भः (वर्णः) | शुद्ध-मेलनम् |
|---|---|---|
| (क) विवृत-प्रयत्नः | (३) ॠ | (क) → (३) ॠ |
| (ख) स्पृष्ट-प्रयत्नः | (५) ध् | (ख) → (५) ध् |
| (ग) ईषत्स्पृष्ट-प्रयत्नः | (१) व् | (ग) → (१) व् |
| (घ) ईषत्विवृत-प्रयत्नः | (२) श् | (घ) → (२) श् |
| (ङ) संवृत-प्रयत्नः | (४) अ | (ङ) → (४) अ (ह्रस्वः) |
अभ्यासः ४ — 'आम्' अथवा 'न' लिखत [पृष्ठ - १६०]
अभ्यासः ५ — रेखाङ्कितपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत [पृष्ठ - १६०]
अभ्यासः ६ — वर्णसमुच्चयं पाठात् चित्वा लिखत [पृष्ठ - १६०]
५. व्याकरणिक-घटकाः (सारण्यः)
(क) कठिन-शब्दार्थ-सारणी [पृष्ठ - १५३]
| क्र.सं. | कठिन शब्द | संस्कृत व्याख्या | हिन्दी अर्थ | English Meaning |
|---|---|---|---|---|
| १ | प्रयत्नः | उच्चारणे प्रयुज्यमानं बलम् | उच्चारण का आन्तरिक बल/दबाव | Effort in Articulation |
| २ | स्पृष्टः | स्पर्शं कृतः | स्पर्श किया हुआ (छुआ हुआ) | Touched |
| ३ | ईषत् | अल्पम् / स्वल्पम् | थोड़ा / कम | Slightly / Little |
| ४ | विवृतः | उद्घाटितः / स्फुटः विवरः | खुला हुआ | Opened |
| ५ | संवृतः | अविस्तृतः / संकीर्णः | सिकुड़ा हुआ / संकुचित | Contracted / Closed |
| ६ | विवरः | छिद्रः / अन्तरालः | अन्तराल या छिद्र | Opening / Gap |
(ख) पाठगत क्रियापद-सारणी
| क्र.सं. | क्रियापदम् | मूल धातु | लकार-पुरुष-वचन | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|---|---|
| १ | भवन्ति | भू (सत्तायाम्) | लट्. प्र.पु. बहुवचनम् | होते हैं |
| २ | स्पृशति | स्पृश् (संस्पर्शने) | लट्. प्र.पु. एकवचनम् | स्पर्श करता है |
| ३ | याति | या (प्रापणे/गतौ) | लट्. प्र.पु. एकवचनम् | जाता है / पहुँचता है |
| ४ | जायन्ते | जन् (प्रादुर्भावे) | लट्. (आत्मने.) प्र.पु. बहु. | उत्पन्न होते हैं |
| ५ | उच्चार्यन्ते | उत् + चर् (कर्मणि) | लट्. प्र.पु. बहुवचनम् | बोले/उच्चारित किए जाते हैं |
(ग) अव्यय-उपसर्ग-प्रत्यय-सारणी
| घटक-प्रकारः | पदम् | संयोजनम् / प्रकृति-प्रत्यय | अर्थः |
|---|---|---|---|
| अव्ययम् | यदा ... तदा | कालवाचक अव्यय-युग्मम् | जब ... तब |
| अव्ययम् | अपि / एव / इव | मूल अव्ययानि | भी / ही / समान |
| उपसर्गः | अवलोकितवन्तः | अव (उपसर्गः) + लोक् + क्तवतु | देखा / अवलोकन किया |
| कृदन्तः | दृष्टवन्तः | दृश् + क्तवतु (पुं. बहुवचनम्) | हम सबने देखा |
| कृदन्तः | विहाय | वि + हा + ल्यप् | छोड़कर |
(घ) पाणिनीय / पाठगत सन्धि-सारणी
| क्र.सं. | सन्धि-पदम् | विच्छेदः | सन्धि-नाम (नियमः) |
|---|---|---|---|
| १ | प्रयत्नो ऽपि | प्रयत्नः + अपि | उत्व-विसर्गसन्धिः / पूर्वरूपसन्धिः |
| २ | बाहाश्च | बाह्यः + च | सत्व-विसर्गसन्धिः (विसर्जनीयस्य सः) |
| ३ | संवृतस्त्वकारः | संवृतः + तु + अकारः | विसर्गसन्धिः + यण्-सन्धिः |
| ४ | इत्येषः | इति + एषः | यण्-सन्धिः (इको यणचि) |
| ५ | अभ्यासाद्जायते | अभ्यासात् + जायते | जश्त्व-व्यञ्जनसन्धिः (झलां जशोऽन्ते) |

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